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क्या यीशु ईश्वर है या ईश्वर द्वारा भेजे गए हैं? (2 का भाग 1)

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विवरण: दो-भाग वाले लेख का पहला भाग जो यीशु की वास्तविक भूमिका पर चर्चा करता है। भाग 1: चर्चा करता है कि क्या यीशु ने स्वयं को ईश्वर कहा? यीशु को प्रभु कहा जाता है, और यीशु के स्वभाव पर चर्चा।

  • द्वारा onereason.org
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 829 (दैनिक औसत: 4)
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IsJesusGodorSentbyGod.jpgयीशु एक ऐसा व्यक्तित्व है जिन्हें दुनिया भर में अरबों लोग प्यार करते हैं और उनका सम्मान करते हैं। फिर भी इस विशाल व्यक्तित्व की गरिमा को लेकर बहुत भ्रम है। मुसलमान और ईसाई दोनों ही यीशु को बहुत सम्मान देते हैं लेकिन उन्हें बहुत अलग तरीके से देखते हैं।

इस लेख में उठाए गए सवालों का मकसद यीशु से संबंधित मुद्दों की तह तक जाना है: क्या यीशु ईश्वर है? या वह ईश्वर द्वारा भेजे गए थे? वास्तव मे ऐतिहासिक यीशु कौन थे?

बाइबिल के कुछ अस्पष्ट छंदों को गलत तरीके से दिखाया जा सकता है, यह दिखाने के लिए कि यीशु किसी तरह से दिव्य थे। लेकिन अगर हम बाइबल के स्पष्ट, सीधे छंदों को देखें, तो हम बार-बार देखते हैं कि यीशु को एक असाधारण इंसान के रूप में संदर्भित किया जा रहा है और इससे ज्यादा कुछ नहीं। जब हम यीशु के जीवन के बारे में ऐतिहासिक और तार्किक तथ्यों पर विचार करते हैं, तो जो सामने आता है, वह न केवल इस बात का निर्णायक प्रमाण है कि यीशु ईश्वर नहीं हो सकते, बल्कि यह कि उन्होंने कभी भी ईश्वर होने का दावा नहीं किया।

तर्क की पांच पंक्तियां इस प्रकार हैं जो इस विषय को स्वयं बाइबल के माध्यम से हमारे लिए स्पष्ट करती हैं और इस तरह हमें वास्तविक यीशु का पता लगाने में मदद करती है।

१.      यीशु ने खुद को कभी ईश्वर नहीं कहा

बाइबिल (समय के साथ परिवर्तित और मिलावटी होने के बावजूद) में कई छंद हैं जिनमें यीशु स्वयं ईश्वर से दूसरे व्यक्ति के रूप मे बात करते हैं। यहां उनमें से कुछ दिए गए हैं:

जब एक व्यक्ति ने यीशु को "अच्छे शिक्षक" के रूप में संबोधित किया, तो उन्होंने उत्तर दिया “आप मुझे अच्छा क्यों कहते हैं? ईश्वर के सिवा कोई अच्छा नही है।'' [मरकुस 10:18]

एक अन्य प्रसंग में वे कहते हैं: "मैं अपने आप कुछ नहीं कर सकता। मैं जो कुछ सुनता हूं, मैं उसका न्याय करता हूं, और मेरा निर्णय न्यायपूर्ण है। मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजनेवाले की इच्छा चाहता हूँ।” [यूहन्ना 5:30]

यीशु खुद से एक अलग प्राणी के रूप में ईश्वर से बात करते हैं: मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने ईश्वर और तुम्हारे ईश्वर के पास जा रहा हूं। [यूहन्ना 20:17]

इस छंद में, वह पुष्टि करते हैं कि वह ईश्वर द्वारा भेजे गए थे: और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे ईश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने। [यूहन्ना 17:3]

यदि यीशु ईश्वर होते तो वह लोगों को अपने से प्रार्थना करने के लिए कहते, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत किया और किसी को भी अपनी प्रार्थना करने से मना कर दिया: और व्यर्थ में वे मुझसे प्रार्थना कर रहे थे [मत्ती 15:9]

अगर यीशु ने खुद ईश्वर होने का दावा किया होता तो बाइबिल में ऐसे सैकड़ों छंद होने चाहिए जो इसका उल्लेख करते। लेकिन पूरी बाइबिल में एक भी छंद ऐसा नहीं है जिसमें यीशु कहते हैं कि मैं ईश्वर हूं, मुझसे प्रार्थना करो।

२.      पुत्र और ईश्वर के रूप में यीशु?

यीशु को कभी-कभी बाइबल में 'प्रभु' और कभी-कभी 'ईश्वर के पुत्र' के रूप में संदर्भित किया जाता है। ईश्वर को 'पिता' कहा जाता है, इसलिए इन नामों को एक साथ रखकर यह दावा किया जा सकता है कि यीशु ईश्वर के पुत्र हैं। लेकिन अगर हम इनमें से प्रत्येक शीर्षक को संदर्भ में देखें तो हम पाएंगे कि वे प्रतीकात्मक हैं और उन्हें शाब्दिक रूप से नहीं लिया जाना चाहिए।

'ईश्वर का पुत्र' एक धर्मी व्यक्ति के लिए प्राचीन हिब्रू में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। ईश्वर इस्राईल को अपना 'पुत्र' कहता है: ईश्वर यह कहता है: इस्राईल मेरा सबसे बड़ा पुत्र है [निर्गमन 4:22]। इसके अलावा, दाऊद को 'ईश्वर का पुत्र' कहा जाता है: ईश्वर ने मुझ से कहा है, 'तू मेरा पुत्र है, आज मैंने तुझे जन्म दिया है।' [भजन 2:7]. वास्तव में, जो कोई भी धर्मी है, उसे ईश्वर का 'पुत्र' कहा जाता है: वे सभी जो ईश्वर की आत्मा के नेतृत्व में हैं, ईश्वर के पुत्र और पुत्रियां हैं [रोमियों 8:14]।

इसी प्रकार जब 'पिता' शब्द का प्रयोग ईश्वर के लिए किया जाता है तो उसे शब्दशः नहीं लेना चाहिए। इसके बजाय, यह कहने का एक तरीका है कि ईश्वर निर्माता, पालनकर्ता, पालन-पोषण करने वाला, आदि है। 'पिता' शब्द के इस प्रतीकात्मक अर्थ को समझने के लिए हमारे लिए कई छंद हैं, उदाहरण के लिए एक ईश्वर और सभी का पिता। [इफिसियों 4:6].

यीशु को कभी-कभी शिष्यों द्वारा 'प्रभु' कहा जाता था। 'प्रभु' एक ऐसा शब्द है जो ईश्वर के लिए और उनके लिए भी प्रयोग किया जाता है जिनके पास उच्च पद है। बाइबल में लोगों के लिए 'प्रभु' शब्द के इस्तेमाल के कई उदाहरण हैं: इसलिए वे (यूसुफ के भाई) यूसुफ के कोषाध्यक्ष के पास गए और घर के द्वार पर उससे बात की। “हम आपसे क्षमा चाहते हैं, हमारे प्रभु," उन्होंने कहा [उत्पत्ति 43:19-20]। साथ ही, बाइबल के अन्य भागों में, यीशु को शिष्यों द्वारा ईश्वर का 'दास' भी कहा जाता है: हमारे पिताओं के ईश्वर ने अपके दास यीशु की महिमा की है। [प्रेरितों के काम 3:13]. यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जब 'प्रभु' का उपयोग यीशु को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, तो यह सम्मान की उपाधि है, देवत्व की नहीं।

३.      यीशु का स्वभाव

यीशु का स्वभाव ईश्वर के स्वभाव से बिलकुल अलग था। बाइबल के ऐसे कई भाग हैं जो स्वभाव के इस अंतर को उजागर करते हैं:

ईश्वर सर्वज्ञ है, लेकिन यीशु ने अपने बारे मे स्वयं कहा था की वो सर्वज्ञ नहीं हैं। यह निम्नलिखित छंद में देखा जा सकता है जब यीशु कहते हैं: “परन्तु कोई नहीं जानता कि वह दिन या घड़ी कब आएगी, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र। पिता ही जानते हैं।" [मत्ती 24:36]

ईश्वर आत्मनिर्भर है और उसे नींद, भोजन या पानी की आवश्यकता नहीं है। परन्तु यीशु ने खाया, पिया, सोया, और ईश्वर पर निर्भर रहे: जैसे जीवित पिता ने मुझे भेजा है, और मैं पिता के कारण जीवित हूं [यूहन्ना 6:57]। यीशु की ईश्वर पर निर्भरता का एक और संकेत यह है कि उसने ईश्वर से प्रार्थना की: थोड़ा और आगे जाकर, वह (यीशु) भूमि पर मुँह के बल गिर पड़ा और प्रार्थना की [मत्ती 26:39]. इससे पता चलता है कि यीशु ने स्वयं ईश्वर से सहायता मांगी थी। ईश्वर, जो प्रार्थनाओं का उत्तर देता है, उसे किसी से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, यीशु ने कहा: मैं पिता के पास जा रहा हूं क्योंकि पिता मुझसे बड़ा है [यूहन्ना 14:28]

बाइबिल में स्पष्ट है कि ईश्वर अदृश्य है और एक मनुष्य नहीं है: क्योंकि कोई मुझे देख कर जीवित नहीं रह सकता [निर्गमन 33:20] ईश्वर मनुष्य नहीं है [गिनती 23:19]. दूसरी ओर यीशु एक ऐसा व्यक्ति था जिसे हजारों लोगों ने देखा था, इसलिए वह ईश्वर नहीं हो सकते। इसके अलावा, बाइबल यह स्पष्ट करती है कि ईश्वर इतने महान हैं कि वह अपनी सृष्टि के अंदर नही हो सकते: लेकिन ईश्वर लोगों के साथ पृथ्वी पर कैसे रह सकता है? यदि आकाश, यहाँ तक कि सर्वोच्च आकाश भी, आपको समाहित नहीं कर सकता है [२ क्रोनिकल्स 6:18]. इस छंद के अनुसार पृथ्वी पर रहने वाला यीशु, ईश्वर नहीं हो सकता।

और बाइबल यीशु को एक पैगंबर बताता है [मत्ती 21:10-11], तो यीशु ईश्वर कैसे हो सकता है और एक ही समय में ईश्वर का पैगंबर कैसे हो सकता है? इसका कोई अर्थ नही है।

इसके अलावा, बाइबल हमें बताती है कि ईश्वर नहीं बदलता: मैं, ईश्वर, नहीं बदलता। [मलाकी 3:6]. हालाँकि यीशु के जीवन में कई बदलाव हुए जैसे उम्र, ऊंचाई, वजन आदि।

ये बाइबल के कुछ प्रमाण हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि यीशु और ईश्वर का स्वभाव पूरी तरह से अलग है। कुछ लोग दावा कर सकते हैं कि यीशु के पास एक मानवीय और एक दिव्य स्वभाव था। यह एक ऐसा दावा है जिसे यीशु ने कभी नहीं किया और स्पष्ट रूप से बाइबल के विपरीत है जो यह कहता है कि ईश्वर का स्वभाव एक है।

 

 

क्या यीशु ईश्वर है या ईश्वर द्वारा भेजे गए हैं? (2 का भाग 2)

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विवरण: दो-भाग वाले लेख का दूसरा भाग जो यीशु की वास्तविक भूमिका पर चर्चा करता है। भाग 2: यह यीशु के संदेश, प्रारंभिक ईसाइयों के विश्वास और यीशु के बारे में इस्लाम के दृष्टिकोण पर चर्चा करता है।

  • द्वारा onereason.org
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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4.      यीशु का संदेश

पुराने नियम के पैगंबरो जैसे इब्राहिम, नूह और युनुस ने कभी यह प्रचार नहीं किया कि ईश्वर ट्रिनिटी का हिस्सा है, और यीशु को अपना उद्धारकर्ता नहीं मानते थे। उनका संदेश सरल था: एक ईश्वर है और वह अकेला ही आपकी प्रार्थना के योग्य है। इसका मतलब यह नहीं है कि ईश्वर ने एक ही आवश्यक संदेश के साथ हजारों वर्षों तक पैगंबरो को भेजा, और फिर अचानक उन्होंने कहा कि वह ट्रिनिटी में से हैं और बचने के लिए यीशु पर विश्वास करना होगा।

सच्चाई यह है कि यीशु ने वही संदेश दिया जो पुराने नियम के पैगंबरो ने प्रचार किया था। बाइबिल में एक पद्य है जो वास्तव में उसके मूल संदेश पर जोर देता है। एक आदमी यीशु के पास आया और पूछा, "पहली आज्ञा कौन सी है?" यीशु ने उत्तर दिया, "सब आज्ञाओं में से यह मुख्य है, हे इस्राएल सुन! यहोवा हमारा ईश्वर एक ही यहोवा है" [मरकुस 12:28-2] तो सबसे बड़ी आज्ञा, यीशु के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण विश्वास यह है कि ईश्वर एक है। यदि यीशु ईश्वर होते तो वह कहते, 'मैं ईश्वर हूँ, मुझसे प्रार्थना करो', लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह केवल पुराने नियम के एक पद को दोहराते हुए पुष्टि करते हैं कि ईश्वर एक है।

कुछ लोगों का दावा है कि यीशु दुनिया के पापों के बदले मरने के लिए आए थे। परन्तु यीशु के निम्नलिखित कथन पर विचार करें: और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे ईश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने। जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है [यूहन्ना 17:3-4]. यीशु के पकड़े जाने और सूली पर चढ़ाए जाने से पहले यह कहा था। इस पद से यह स्पष्ट है कि यीशु संसार के पापों के बदले मरने के लिए नहीं आया था, क्योंकि उसने उस कार्य को पूरा किया जो ईश्वर ने उसे सूली पर चढ़ाए जाने से पहले दिया था।

साथ ही, यीशु ने कहा "उद्धार यहूदियों का है" [यूहन्ना 4:22]. तो इसके अनुसार, हमें ट्रिनिटी में विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है या इसमें भी कि यीशु हमारे पापों के लिए मर गए ताकि हमें मोक्ष मिल सके क्योंकि यहूदि भी इसमें विश्वास नहीं करते हैं।

5.      प्रारंभिक ईसाई

ऐतिहासिक रूप से ईसाई धर्म की शुरुआत में ऐसे कई समुदाय थे जिनका यीशु में बहुत विश्वास था[1]। कुछ का मानना ​​​​था कि यीशु ईश्वर था, दूसरों का मानना ​​​​था कि यीशु ईश्वर नहीं बल्कि आंशिक रूप से दिव्य था, और कुछ का मानना ​​​​था कि वह एक इंसान था और इससे ज्यादा कुछ नहीं। त्रिमूर्तिवादी ईसाई धर्म जो मानता है कि ईश्वर, यीशु और पवित्र आत्मा है, तीन में से एक ईसाई धर्म का प्रमुख समुदाय बन गया, इसे एक बार औपचारिक रूप से चौथी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के राज्य धर्म में बदल दिया गया था। ईसाई जिन्होंने यीशु को ईश्वर के रूप में अस्वीकार कर दिया था उन्हें रोमन अधिकारियों द्वारा सताया गया था[2]. उस समय के बाद से ईसाइयों के बीच ट्रिनिटी का विश्वास व्यापक हो गया। प्रारंभिक ईसाई धर्म में विभिन्न आंदोलन थे जिन्होंने ट्रिनिटी को नकार दिया, उनमें से सबसे प्रसिद्ध दत्तक ग्रहणवाद और एरियनवाद है।

प्रारंभिक ईसाई धर्म के विशेषज्ञ डॉ. गेराल्ड डार्केस कहते हैं: प्रारंभिक ईसाई धर्म यीशु के स्वाभाव के बारे में बहुत विवादास्पद थे। प्रारंभिक ईसाई धर्म के भीतर विभिन्न दत्तक-ग्रहणवादी पद असंख्य थे और जो कभी-कभी हावी थे। कोई यह भी मान सकता है कि एरियान और नेस्टोरियन ईसाई धर्म आज ईसाई धर्म का एक बहुत बड़ा स्रोत होगा यदि यह इस तथ्य के लिए नहीं था कि ईसाई धर्म की ये दो शाखाएँ, जो मूल रूप से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में स्थित थीं, यीशु के स्वभाव के बारे में इस्लामी शिक्षाओं के समान थे कि सातवीं शताब्दी की शुरुआत में वे स्वाभाविक रूप से इस्लाम में लीन हो गए थे।"[3]

चूँकि ईसाई धर्म के शुरुआती दिनों में कई समुदाय थे, जिनमें से प्रत्येक में यीशु और बाइबल के अपने संस्करणों के बारे में अलग-अलग मान्यताएं थीं, हम किसे कह सकते हैं कि यीशु की सच्ची शिक्षाओं का पालन करते थे?

इसका अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर ने नूह, इब्राहिम और मूसा जैसे अनगिनत पैगंबरो को लोगों को एक ईश्वर में विश्वास करने के लिए कहने को भेजा, और फिर अचानक ट्रिनिटी का एक अलग संदेश भेजा जिसने उसके पिछले पैगंबरो की शिक्षाओं का खंडन किया। यह स्पष्ट है कि ईसाई समुदाय जो यीशु को एक मानव पैगंबर के रूप में मानता था और कुछ भी नहीं यीशु की सच्ची शिक्षाओं का पालन कर रहा था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी ईश्वर की अवधारणा वही है जो पुराने नियम में पैगंबरो द्वारा सिखाई गई थी।

इस्लाम में यीशु

यीशु के बारे में इस्लामी विश्वास हमारे लिए यह रहस्योद्घाटन करता है कि वास्तविक यीशु कौन थे। इस्लाम में यीशु एक असाधारण व्यक्ति थे, जिन्हें ईश्वर ने पैगंबर के रूप में चुना और यहूदी लोगों के लिए भेजा। उन्होंने कभी यह प्रचार नहीं किया कि वे स्वयं ईश्वर हैं या ईश्वर के वास्तविक पुत्र हैं। वह चमत्कारिक रूप से बिना पिता के पैदा हुए थे, और उसने कई अद्भुत चमत्कार किए जैसे कि अंधे और कोढ़ियों को ठीक करना और मरे हुओं को जीवित करना - सभी ईश्वर की अनुमति से। मुसलमानों का मानना है कि यीशु दुनिया में न्याय और शांति लाने के लिए न्याय के दिन से पहले लौट आएंगे। यीशु के बारे में यह इस्लामी मान्यता प्रारंभिक ईसाइयों की कुछ मान्यताओं के समान है। क़ुरआन में ईश्वर ईसाइयों को यीशु के बारे में निम्नलिखित तरीकों से संबोधित करता है:

हे अहले किताब (ईसाईयो!) अपने धर्म में अधिकता न करो और ईश्वर पर केवल सत्य ही बोलो। मसीह़ मरयम का पुत्र केवल ईश्वर का दूत और उसका शब्द है, जिसे (ईश्वर ने) मरयम की ओर डाल दिया तथा उसकी ओर से एक आत्मा है, अतः, ईश्वर और उसके दूतों पर विश्वास करो और ये न कहो कि (ईश्वर) तीन हैं, इससे रुक जाओ, यही तुम्हारे लिए अच्छा है, इसके सिवा कुछ नहीं कि ईश्वर ही अकेला पूज्य है, वह इससे पवित्र है कि उसका कोई पुत्र हो, आकाशों तथा धरती में जो कुछ है, उसी का है और ईश्वर काम बनाने के लिए बहुत है। [क़ुरआन 4:171]

इस्लाम सिर्फ एक और धर्म नहीं है। यह वही संदेश है जिसका प्रचार मूसा, यीशु और इब्राहिम ने किया था। इस्लाम का शाब्दिक अर्थ है 'ईश्वर के सामने समर्पण' और यह हमें ईश्वर के साथ सीधा संबंध रखना सिखाता है। यह हमें याद दिलाता है कि, चूंकि ईश्वर ने हमें बनाया है, तो ईश्वर के सिवा किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। इस्लाम यह भी सिखाता है कि ईश्वर इंसान जैसा कुछ भी नहीं है या न किसी ऐसी चीज जैसा जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं। क़ुरआन में ईश्वर के बारे में संक्षेप में वर्णन किया गया है:

"कह दोः ईश्वर अकेला है। ईश्वर निरपेक्ष और सर्वाधार है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न उसके बराबर कोई है।" (क़ुरआन 112:1-4)[4]

मुसलमान बनना यीशु से मुंह मोड़ना नहीं है। बल्कि यह यीशु की मूल शिक्षाओं पर वापस जाना और उसका पालन करना है। 



फुटनोट:

[1] जॉन इवांस, हिस्ट्री ऑफ़ आल क्रिस्चियन सेक्ट्स एंड डेनोमिनेशन, आईएसबीएन: 0559228791

[2] सी.एन. कोलिट्सस, द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ कॉन्सटेंटाइन द ग्रेट, आईएसबीएन: 1419660411

[3] डॉ. जेराल्ड डर्क्स द्वारा लिखित 'इस्लामिक ट्राजेक्टोरिस इन अर्ली क्रिश्चियनिटी' से अंश

[4] ईश्वर नर या नारी नहीं है, 'वह' शब्द जब ईश्वर के लिए प्रयोग किया जाता है, तो वह लिंग का उल्लेख नहीं करता है।

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