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परलोक में यात्रा (8 का भाग 1): परिचय

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विवरण: इस्लाम में मृत्यु के बाद के अस्तित्व के सिद्धांत और कैसे यह हमारे जीवन को ध्येय के साथ अर्थपूर्ण बनाता है; दोनों का एक परिचय।

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 05 Jun 2022
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 1601 (दैनिक औसत: 7)
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परिचय

इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद, जिनकी मृत्यु 632 में हुई थी, उन्होंने कहा था:

"जिब्रईल मेरे पास आए और कहा, 'ओ मुहम्मद, जैसे जी चाहे जियो, क्योंकि आखिर में तो तुम्हें मरना ही है। जिसे चाहो उसे प्यार करो, क्योंकि आखिर में तो तुम्हें बिछुड़ना ही है। जो जी चाहे करो, क्योंकि तुम्हें उसका परिणाम भुगतना ही है। यह जान लो कि रात में की गई प्रार्थना[1]  एक आस्तिक के लिये सम्मान की बात है, और उसका स्वाभिमान उसके दूसरों से स्वतंत्र रहने में है।" (सिलसिला- अल सहीह)

जीवन के बारे में अगर कुछ निश्चित है, तो वह है उसका अंत। यह सत्य स्वाभाविक रूप अधिकतर मनुष्यों के जीवन में कम से कम एक बार प्रश्न बनकर उद्वेलित करता है: मृत्यु के बाद क्या?

शारीरिक स्तर पर, मृत व्यक्ति का जो होता है वह सबको पता है। अगर कारण सामान्य हैं,[2]  तो हृदय धड़कना बंद कर देता है, फेफड़े सांस लेना बंद कर देते हैं, और शरीर की कोशिकाओं को रक्त और ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाता है। बाहरी तत्वों तक रक्त के प्रवाह का रुकना उन्हें पीला कर देता है। ऑक्सीजन के बंद हो जाने से, कोशिकाएँ कुछ समय तक तो बिना ऑक्सीजन के साँस लेती हैं, जिससे लैक्टिक एसिड बनने लगता है, जिससे रिगर मॉर्टिस हो जाता है - शव की मांसपेशियों का अकड़ने लगना। उसके बाद, जैसे ही कोशिकाएँ विघटित होने लगती हैं, अकड़न कम हो जाती है, जीभ बाहर आ जाती है, तापमान गिर जाता है, त्वचा का रंग बदरंग हो जाता है, मांस सड़ने लगता है, और परजीवी उसे खाने लगते हैं - जब तक कि सूखे हुए दांत और हड्डियाँ न बच जाएँ।

जहाँ तक मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा का प्रश्न है, यह ऐसी नहीं है जिसे देखा जा सके, और न जिसका वैज्ञानिक शोध से पता लगाया जा सके। यहाँ तक कि जीवित शरीर में, किसी की चेतना, या आत्मा से कोई अनुभवजन्य प्रयोग किया जा सके। यह मनुष्य के नियंत्रण में बिल्कुल नहीं है। इस बारे में, परलोक की अवधारणा - मृत्यु पश्चात जीवन, पुनर्जीवन, और परिणाम का दिन ; साथ ही दिव्य ईश्वरीय, सर्वशक्तिमान निर्माता, उसके देवदूत, भाग्य आदि आदि - की परिकल्पना, अनदेखे में विश्वास का विषय हैं। मनुष्य के पास अनदेखे संसार के बारे में कुछ भी जानने का तरीका ईश्वरीय रहस्योद्घाटन ही है।

"और अनदेखे का रहस्य ईश्वर के पास है, उसके सिवा किसी को नहीं मालूम। और उसे ही मालूम है जो कुछ भी है पृथ्वी में (या उस पर) और समुद्र में। एक पत्ता भी गिरता है, उसे पता रहता है। पृथ्वी के अंधकार में ऐसा कुछ नहीं, न ही कुछ ताज़ा न ही सूखा, जो एक स्पष्ट रिकॉर्ड में न लिखा हो।" (क़ुरआन 6:59)

पहले आये पैगंबरो को बताए गए उपदेश जैसे तौरात, ज़बूर, इंजील सब मे परलोक का वर्णन है, यह केवल ईश्वर के मानवता के लिये अपने अंतिम पैगंबर, मुहम्मद को दिए गए अंतिम रहस्योद्घाटन, यानी पवित्र क़ुरआन ही है, जिससे हमें ईश्वर के जीवन के बारे में सबसे अधिक पता चलता है। और क़ुरआन जैसा है सदा वैसा ही रहेगा, मनुष्य द्वारा सरंक्षित और अनछुई, आस्तिकों को उस अनदेखे संसार के बारे में जो ज्ञान देता है, वह उतना ही वास्तविक और सच्चा है जो किसी भी वैज्ञानिक प्रयास से सीखा जा सकता है (और वह भी शून्य त्रुटि के साथ!)।

"...हम इस पुस्तक में कुछ भी नहीं भूले हैं; तब अपने ईश्वर तक वे सब एकत्र किए जाएंगे।" (क़ुरआन 6:38)

हमारे मरने के बाद क्या होता है, इस प्रश्न के साथ, एक और प्रश्न है: हम यहाँ क्यों हैं? क्योंकि अगर वाकई मृत्यु के बाद जीवन का कोई ध्येय नहीं है (अर्थात केवल यह जीवन जीते जाना), तो फिर यह प्रश्न कि मृत्यु के बाद क्या होता है, केवल किताबी बन जाता है, बेकार न कहें तो। पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी बुद्धिमत्तापूर्ण संरचना, हमारे सृजन के पीछे एक बुद्धिमत्ता और एक रचनाकार का होना आवश्यक है, अर्थात एक निर्माता है जो हमारा कार्यों का मूल्यांकन करता है, तभी इस पृथ्वी पर जीवन का कोई गहरा अर्थ समझ आएगा।

"क्या तुमने समझ रखा है कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और तुम हमारी ओर फिर नहीं लाये जाओगे? तो सर्वोच्च है ईश्वर वास्तविक अधिपति, नहीं है कोई सच्चा पूज्य, परन्तु वही महिमावान अर्श (सिंहासन) का स्वामी। " (क़ुरआन 23:115-116)

अगर ऐसा नहीं है तो, एक जागरूक व्यक्ति यह निष्कर्ष निकालने पर विवश हो जाएगा कि पृथ्वी पर जो जीवन है वह अन्याय, क्रूरता और शोषण से भरा है; कि जंगल का कानून, सबसे सक्षम ही जीवित रहेगा का नियम ही सर्वोपरि है; कि अगर हम इस जीवन में प्रसन्न नहीं रहते हैं, चाहे वह भौतिक सुविधाओं, शारीरिक प्रेम, या दूसरी खुशियों के अनुभवों के अभाव के कारण हो, तो जीवन जीने योग्य नहीं है। असल में, यही कारण है कि अगर कोई व्यक्ति इस सांसारिक जीवन से निराश हो जाता है, क्योंकि उसे परलोक जीवन में विश्वास बिल्कुल नहीं, थोड़ा, या आधा अधूरा विश्वास है, तो वह आत्महत्या भी कर सकता है। आखिर, उन दुखी, बिना प्यार के, अनचाहे; निराश, (बेइंतिहा) अवसाद में डूबे और मायूस लोगों को खोने के लिये होगा भी क्या?![3]

"अपने पालनहार की दया से निराश, केवल कुपथ लोग ही हुआ करते हैं।" (क़ुरआन 15:56)

तो क्या हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि मृत्यु शरीर के अंत तक ही सीमित है, या जीवन केवल एक अंधे, स्वार्थ से भरे विकास का परिणाम है? निश्चय ही, मृत्यु से आगे भी कुछ है, और जीवन भी इसके अलावा कुछ और भी है।


फ़ुटनोट:

[1] रात में स्वेच्छा से की गई औपचारिक प्रार्थना (नमाज़), रोजाना की पांचों प्रार्थनाओं में अंतिम (ईशा) के बाद और पहली (फ़जर) से पहले। इस प्रार्थना का सबसे अच्छा समय रात का अंतिम तीसरा पहर होता है।

[2] यद्यपि हृदय को कृत्रिम तरीके से धड़कने दिया जा सकता है, और रक्त को कृत्रिम तरीके से पंप किया जा सकता है, अगर मस्तिष्क मृत हो, और पूरा शरीर भी ऐसा ही हो।

[3] संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट ' वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे’, "युद्ध में और हत्याओं से होने वाली कुल मौतों की तुलना में कहीं अधिक लोग आत्महत्या करते हैं...लगभग 2 से 6 करोड़ लोग हर वर्ष आत्महत्या करते हैं, लेकिन उनमें से करीब 1 करोड़ सफल हो पाते हैं।" (रेऊटर्ससितंबर 8, 2006)

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 2): कब्र में आस्तिक

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विवरण: सच्चे आस्तिकों के लिये मृत्यु और न्याय के दिन के बीच कब्र में बीतने वाले समय का विवरण।

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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कब्र की दुनिया

अब हम मृत्यु के बाद आत्मा की होने वाली यात्रा के बारे में थोड़ा जानेंगे। यह सच में बहुत आश्चर्यजनक कथा है, क्योंकि पहली बात तो यह सच है और दूसरे हम सबको यह यात्रा करनी है। इस यात्रा के बारे में हमारे पास जो भी जानकारी है उसकी गहराई, उसकी बारीकी और विस्तार, इस बात का पक्का संकेत हैं कि मुहम्मद सच में मानवता के लिये ईश्वर के अंतिम पैगंबर थे। उनके मालिक ने जो ज्ञान उन्हें दिया और फिर पैगंबर ने वह हमको बताया, वह मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में जितना स्पष्ट है उतना ही विस्तृत भी है। इस ज्ञान में झाँकने का आरंभ हम उस यात्रा के बारे में थोड़ी जानकारी लेने से करेंगे, जो एक आस्तिक की आत्मा मृत्यु के क्षण से स्वर्ग में विश्राम लेने तक करती है।

जब एक आस्तिक इस संसार को छोड़ने लगता है, तब सफ़ेद स्वर्गदूत स्वर्ग से उतरते हैं और कहते हैं:

"ओ शांत आत्मा, ईश्वर की क्षमा पाने और उसका आशीर्वाद लेने के लिये बाहर आओ।" (हकीम और अन्य)

आस्तिक तब अपने निर्माता से मिलने का इच्छुक हो जाएगा, जैसा कि पैगंबर (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने समझाया:

"...जब एक आस्तिक की मृत्यु का समय पास आता है, तो उसे अच्छा समाचार मिलता है कि ईश्वर उसके लिये प्रसन्न हैं और उनका आशीर्वाद उसके साथ है, और उस समय भविष्य में उसके साथ जो होने वाला है उसके अतिरिक्त उसे और कुछ अच्छा नहीं लगता। उसे ईश्वर से होने वाले मिलन की बेहद खुशी होती है, और ईश्वर को उससे मिलने की।" (सहीह अल-बुखारी)

आत्मा शांतिपूर्वक शरीर से बाहर आ जाती है जैसे मशक से पानी की एक बूंद बाहर आ जाती है, और तब स्वर्गदूत उसे थाम लेते हैं:

स्वर्गदूत धीरे से उसे निकाल लेते हैं, यह कहते हुए:

"...डरो नहीं और दुखी मत हो, और स्वर्ग की जिन सुविधाओं का तुमसे वायदा किया गया था उन्हें स्वीकार करो। इस सांसारिक जीवन में हम तुम्हारे साथ थे और (वैसे ही) यहाँ से आगे भी हैं, और यहाँ से जाने के बाद तुम्हें वह सब कुछ मिलेगा जिसकी तुम्हारी आत्मा इच्छा करेगी, और तुम जिस भी सुविधा के लिये प्रार्थना [या इच्छा] करोगे तुम्हें मिलेगा, उस क्षमावान और दयालु शक्ति के आथित्य के तौर पर।" (क़ुरआन 41:30-32)

शरीर से बाहर निकालने के बाद, स्वर्गदूत आत्मा को कस्तूरी से सुगंधित चादर में लपेट लेते हैं और स्वर्ग के लिये उड़ जाते हैं। जैसे ही स्वर्ग के दरवाजे आत्मा के लिये खुलते हैं, दूसरे स्वर्गदूत उसका स्वागत करते हैं:

"पृथ्वी से एक अच्छी आत्मा आई है, ईश्वर आपको और आपके शरीर को जिसमें आप रहते थे, आशीर्वाद देते हैं।"

...जीवन में जिस सर्वश्रेष्ठ नाम से उसे बुलाया जाता था उस नाम से उसका परिचय कराया जाता है। ईश्वर अपनी "किताब" में वह लिखने का आदेश देते हैं, और आत्मा फिर पृथ्वी पर वापस लौटा दी जाती है।

आत्मा तब कब्र में, जिसे बरजख कहते हैं, न्याय दिवस की प्रतीक्षा में शांत पड़ी रहती है। दो भयानक, डरावने स्वर्गदूत जिनका नाम मुनकर और नकीर होता है, आत्मा से उसके धर्म, ईश्वर और पैगंबर के बारे में पूछने उसके पास आते हैं। जैसे ही ईश्वर, स्वर्गदूतों को पूरे विश्वास और निश्चितता से उत्तर देने के लिये आत्मा को शक्ति प्रदान करते हैं, आस्तिक की आत्मा सीधी बैठ जाती है।[1]

मुनकर और नकीर: "तुम्हारा धर्म कौन सा है?"

आस्तिक आत्मा: "इस्लाम।"

मुनकर और नकीर: "तुम्हारा मालिक कौन है?"

आस्तिक आत्मा: "अल्लाह।"

मुनकर और नकीर: "तुम्हारा पैगंबर कौन है?" ( या तुम इस व्यक्ति के बारे में क्या जानते हो?")

आस्तिक आत्मा: "मुहम्मद।"

मुनकर और नकीर: "तुम्हें इन बातों का कैसे पता चला?"

आस्तिक आत्मा: "मैंने अल्लाह की किताब पढ़ी (अर्थात क़ुरआन) और मैंने विश्वास किया।"

तब, जब आत्मा परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाती है, तो स्वर्ग से एक आवाज़ आती है:

"मेरे सेवक ने सत्य कहा है, इसे स्वर्ग की सुविधाएँ दी जाएँ, स्वर्ग से कपड़े दिए जाएँ, और इसके लिये स्वर्ग का एक द्वार खोल दिया जाए।"

आस्तिक की कब्र में और जगह बनाई जाती है और उसमें प्रकाश भर दिया जाता है। उसको दिखाया जाता है कि अगर वह एक दुष्ट पापी होता तो नरक में उसका घर कैसा होता, और फिर रोज़ सुबह और शाम एक झरोखा उसके लिये खोला जाता है जिसमें स्वर्ग में उसका असली घर दिखाया जाता है। उत्तेजित होकर और हर्ष के अतिरेक से, आस्तिक पूछता रहेगा: 'वह घड़ी (फिर से पुनर्जीवित हो जाने की) कब आएगी?! वह घड़ी कब आएगी?!' जब तक कि उसे शांत रहने के लिये नहीं कह दिया जाता।[2]



फ़ुटनोट:

[1] मुसनाह अहमद

[2] अल-तिर्मिज़ी

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 3): न्याय के दिन आस्तिक

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विवरण: आस्तिक लेखे-जोखे के दिन कैसा अनुभव करेंगे, और आस्तिको के कुछ गुण जो स्वर्ग के द्वार तक जाने वाले उनके मार्ग को सरल बना देंगे।

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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प्रलय का दिन

"उस दिन इन्सान अपने भाई से भागेगा, तथा अपने माता और पिता से, एवं अपनी पत्नी तथा अपने पुत्रों से। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन अपनी पड़ी होगी। " (क़ुरआन 80:34-37)

पुनरुत्थान की घटना एक भयानक, भीषण समय होगा। फिर भी, इसके आघात के बावजूद, आस्तिक आनंदित होगा, जैसे कि पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने ईश्वर की ओर से हमें बताया।:

ईश्वर कहता है, "मेरी महिमा और महात्म्य से, मैं अपने दास को दो प्रतिभूतियां और दो भय नहीं दूंगा। यदि वह दुनिया में मुझ से सुरक्षित महसूस करता था [1], तो जिस दिन मैं अपने दासों को एक साथ इकट्ठा करूंगा, उस दिन मैं उसमें डर पैदा करूंगा और यदि वह दुनिया में मुझ से डरता था, तो जिस दिन मैं अपने दासों को इकट्ठा करूंगा, उस दिन मैं उसको सुरक्षित अनुभव कराऊंगा।"[2]

"सुनो! जो ईश्वर के मित्र हैं, न उन्हें कोई भय होगा और न वे उदासीन होंगे: वे जो आस्था रखते थे और ईश्वर से डरते थे (इस जीवन में); उनके लिए सांसारिक जीवन और परलोक में शुभ सूचना है। ईश्वर के वचनों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। वास्तव में यह बड़ी सफलता है।“ (क़ुरआन 10:62-64)

जब आज तक जन्मे सभी मनुष्यों को सूर्य के भीषण ताप के नीचे एक विशाल मैदान पर नग्न और खतनारहित खड़े होने के लिए एकत्र किया जायेगा, तो धार्मिक पुरुषों और महिलाओं का एक समूह ईश्वर के सिंहासन के नीचे छाया में रहेगा। पैगंबर मुहम्मद ने भविष्यवाणी की थी कि उस दिन ये भाग्यशाली आत्माएं कौन होंगी, जब कोई अन्य छत्र-छाया उपलब्ध नहीं होगी:[3]

·       न्यायी शासक जिसने अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया, वरन् लोगों के बीच दैवीय रूप से प्रकट न्याय की स्थापना की

·       ऐसा युवक जो अपने ईश्वर की पूजा करते हुए बड़ा हुआ और जिसने पवित्र रहने के लिए अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में रखा

·       जिनके ह्रदय मस्जिदों से जुड़े हुए थे, हर बार जब वे वहां से जाते थे तो लौटने की लालसा रखते थे

·       जो ईश्वर के लिए एक दूसरे से प्रेम करते थे

·       वे जो सुंदर मोहिनी स्त्रियों द्वारा लुभाए गए थे, लेकिन ईश्वर के भय ने उन्हें पाप करने से रोक दिया

·       जिसने ईश्वर के लिए ईमानदारी से दान में खर्च किया, और अपने दान को गुप्त रखा

·       वह जो एकांत में ईश्वर के भय से रोया

पूजा के विशिष्ट कार्य भी उस दिन लोगों को सुरक्षित रखेंगे, अर्थात्:

·       इस संसार में व्यथित लोगों के कष्ट दूर करने, दरिद्रों की सहायता करने, और दूसरों की गलतियों को अनदेखा करने और क्षमा करने के प्रयासों से प्रलय और न्याय के दिन पर लोगों के स्वयं के संकट दूर होंगे[4]

·       ऋणग्रस्तों के प्रति उदारता दिखाना[5]

·       न्यायी लोग जो अपने परिवारों और उन्हें सौंपे गए विषयों के प्रति न्यायपूर्ण हैं[6]

·      क्रोध पर नियंत्रण में रखना[7]

·       जो कोई प्रार्थना के लिए बुलाता है[8]

·       इस्लाम की अवस्था में वृद्ध होना[9]

·       नियमित रूप से और ठीक से धार्मिक रीतिनुसार मज्जन स्नान (वुजू) करना[10]

·       जो मरियम के पुत्र यीशु के तरफ से मसीह विरोधी और उसकी सेना के विरुद्ध लड़ते हैं[11]

·       शहीद

ईश्वर आस्तिक को अपने पास लाएंगे, उसे आश्रय देंगे, उसे आवरण देंगे, और उससे उसके पापों के बारे में पूछेंगे। अपने पापों को स्वीकार करने के बाद वह सोचेगा कि वह अपराधी है और विनाश सुनिश्चित है, किन्तु ईश्वर कहेंगे:

"मैंने इसे तुम्हारे लिए दुनिया में छुपा कर रखा है, और मैं इसे आज के दिन तुम्हारे लिए क्षमा करता हूँ।"

उसकी कमियों के लिए उसे फटकार लगाई जाएगी,[12]  परन्तु उसके बाद उसके अच्छे कामों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दे दिया जाएगा।[13]

"फिर जिस को उसका लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, उसका न्याय दयालुता से किया जाएगा और वह प्रसन्नतापूर्वक अपने लोगों के पास लौटेगा।" (क़ुरआन 84:7-8)

अपने अभिलेख को देखकर प्रसन्नपूर्वक, वह अपने हर्ष की घोषणा करेगा:

"फिर जिसे दिया जायेगा उसका कर्मपत्र दायें हाथ में, वह कहेगाः ये लो मेरा कर्मपत्र पढ़ो। मुझे विश्वास था कि मैं मिलने वाला हूँ अपने ह़िसाब से। तो वह अपने मन चाहे सुख में होगा। उच्च श्रेणी के स्वर्ग में। जिसके फलों के गुच्छे झुक रहे होंगे। (उनसे कहा जायेगाः) खाओ तथा पियो आनन्द लेकर उसके बदले, जो तुमने किया है विगत दिनों (संसार) में।’" (क़ुरआन 69:19-24)

फिर अच्छे कर्मों के लेखेजोखे को तौला जाएगा, शाब्दशः, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या यह व्यक्ति के बुरे कर्मों से अधिक है, ताकि पुरस्कार अथवा दंड तदनुसार दिया जा सके।

"और हम पुनरुत्थान के दिन न्याय का तराजू रखते हैं, ताकि किसी भी आत्मा के साथ अन्याय न हो। और यदि राई के दाने के तौल [कोई भी कर्म] जितने छोटे कर्म भी हैं, तो हम उसका हिसाब करेंगे। और हम उनका न्याय करने के लिए पर्याप्त सक्षम हैं।" (क़ुरआन 21:47)

"जिसने एक परमाणु जितना भी अच्छा काम किया होगा, वह देखेगा कि उसे (उसके श्रम का अच्छा फल) प्राप्त होगा।" (क़ुरआन 99:7)

"पुनरुत्थान के दिन [विश्वास के साक्ष्य के बाद] किसी व्यक्ति के तराजू में जो वस्तु सबसे भारी होगी, वह है अच्छे आचरण, और ईश्वर घृणा करता है अश्लील, अनैतिक व्यक्ति से।" (अल-तिर्मिज़ी)

आस्थावान लोग पैगंबर मुहम्मद को समर्पित एक विशेष जलाशय से अपनी प्यास बुझाएंगे। जो कोई उस जल को पीएगा, उसे फिर कभी प्यास नहीं लगेगी। इसकी सुंदरता, विशालता और मधुर, उत्तम स्वाद का वर्णन पैगंबर द्वारा विस्तार से किया गया है।

आस्थाहीनों को नर्क में धकेल देने के बाद, इस्लाम में विश्वास करने वाले - उनमें से पापी और पवित्र दोनों - और साथ ही पाखंडी लोग विशाल मैदान में बचेंगे। उनके और स्वर्ग की बीच नर्क की आग पर से गुजरता हुआ उर अँधेरे में डूबा हुआ एक लंबा पुल होगा।[14]  आस्थावान लोग नर्क की गर्जना करती आग को तेजी से पार कर पायेंगे, ईश्वर प्रदत्त ‘प्रकाश’ उन्हें शाश्वत घर का मार्ग दिखायेगा:

"उस दिन तुम आस्थावान पुरुषों और आस्थावान स्त्रियों को देखोगे, प्रकाश उनके आगे-आगे होगा और उनके दाहिने ओर होगा, [यह कहा जाएगा], 'आज तुम्हें शुभ समाचार है उन बाग़ों का जिनके नीचे नदियाँ बहती हैं, जिनमें तू सदा रहेगा।' यही महान सफलता है।” (क़ुरआन 57:12)

अंत में, पुल पार करने के बाद, आस्थावानों को स्वर्ग में प्रवेश करने से पहले शुद्ध किया जाएगा। आस्थावानों के बीच सभी विवाद सुलझा दिए जाएंगे ताकि कोई पुरुष दूसरे के विरुद्ध द्वेषभाव न रखे।[15]



फ़ुटनोट:

[1] इस अर्थ में कि वह ईश्वर की सजा से नहीं डरता और पाप करता है

[2] सिलसिला अल-सहीह

[3] सहीह अल-बुख़ारी

[4] सहीह अल-बुख़ारी

[5] मिशकात

[6] सहीह मुस्लिम

[7] मुसनद

[8] सहीह मुस्लिम

[9] जामी अल-सघीर

[10] सहीह अल-बुख़ारी

[11] इब्न मजह

[12] मिशकात

[13] सहीह अल-बुख़ारी । एक संकेत कि वे स्वर्ग के निवाई हैं, उन लोगों के विपरीत जिन्हें उनके बाएं हाथों में या उनकी पीठ के पीछे उनके कर्मों का अभिलेख दिया जाएगा।

[14] सहीह मुस्लिम

[15] सहीह अल-बुख़ारी

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 4): आस्तिक और स्वर्ग

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विवरण: आस्था के बल पर स्वर्ग तक पहुँचने वाले का वहाँ कैसे स्वागत किया जाता है।

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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स्वर्ग

आस्तिकों को स्वर्ग के आठ शानदार दरवाजों की ओर लाया जाएगा। वहाँ पर उनका देवदूतों द्वारा एक उल्लास भरा स्वागत किया जाएगा और उनको सुरक्षित पहुँचने और नरक से मुक्ति पाने के लिये बधाई दी जाएगी।

"तथा भेज दिये जायेंगे, जो लोग डरते रहे अपने पालनहार से, स्वर्ग की ओर झुण्ड बनाकर। यहाँतक कि जब वे आ जायेंगे उसके पास तथा खोल दिये जायेंगे उसके द्वार और कहेंगे उनसे उसके रक्षकः सलाम है तुमपर, तुम प्रसन्न रहो। तुम प्रवेश कर जाओ उसमें, सदावासी होकर।" (क़ुरआन 39:73)

हे शान्त आत्मा! अपने पालनहार की ओर चल, तू उससे प्रसन्न, और वह तुझ से प्रसन्न। तू मेरे भक्तों में प्रवेश कर जा। और मेरे स्वर्ग में प्रवेश कर जा!" (क़ुरआन 89:27-30)

सबसे अच्छे मुस्लिम पहले स्वर्ग में प्रवेश करेंगे। उनमें सबसे अधिक नीतिपरायण सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ेंगे।[1]

"लेकिन जो भी ईश्वर के पास आस्तिक की तरह आएगा ( उसे एक मानते हुए, आदि।) और जिसने नीतिपरक अच्छे कार्य किए होंगे; उनके लिए ऐसे ही ऊंचे पद हैं (परलोक में)।" (क़ुरआन 20:75)

"और अग्रगामी तो अग्रगामी ही हैं। वही (ईश्वर के) समीप किये हुए हैं। वे सुखों के स्वर्गों में होंगे।" (क़ुरआन 56:10-2)

क़ुरआन में दिए गए स्वर्ग के इस विवरण से हमें ज्ञात होता है कि यह कितनी भव्य जगह है। एक शास्वत घर जो हमारी सभी उचित इच्छाओं को पूरा करेगा, हमारी सभी इंद्रियों को लुभाएगा, जो भी हम संभवतः चाहेंगे उन्हें पूरा करेगा और यही नहीं इसके अलावा और बहुत कुछ। ईश्वर ने अपने स्वर्ग का विवरण कुछ ऐसे दिया है कि यहाँ की मिट्टी बढ़िया महीन कस्तूरी से बनी है,[2]  केसर की भूमि है,[3] सोने चांदी की ईंटें, और मोती माणिक के पत्थर हैं। स्वर्ग के उद्यानों के नीचे चमकदार पानी, मीठे दूध, पारदर्शी शहद, और बिना नशे की मदिरा की नदियां बह रही हैं। नदी के किनारों पर तंबू, खोखले मोतियों के डोम से बने हैं।[4]  सारी जगह चमकते, मीठी सुगंध देते पौधों की सुगंधों से भरी हुई है, जिसका दूर से भी आनंद लिया जा सकता है।[5]  वहाँ ऊंचे ऊचे महल हैं, विशाल अट्टालिकाएँ हैं, अंगूर के बगीचे, खजूर और अनार के पेड़ हैं,[6] कमल और बबूल के पेड़ हैं जिनके तने सोने के हैं।[7]  हर तरह के पके हुए फलों की भरमार है: जामुन, चकोतरा, ड्रूप्स, अंगूर, खरबूजे, पोम; सब तरह के फल, उष्णदेशीय और विदेशी; हर चीज़ जिसकी आस्तिक कामना कर सकते हैं!

"... जिसे उनका मन चाहेगा और जिसे उनकी आँखें देखकर आनन्द लेंगी..." (क़ुरआन 43:71)

हर आस्तिक के लिये एक सबसे सुंदर, पवित्र और प्रिय साथी, शानदार कपड़े पहने हुए; और भी बहुत कुछ होगा इस शाश्वत, दमकती उल्लास की नई दुनिया में।

"और किसी आत्मा को पता नहीं होगा कि उनके लिये आँखों को आराम देने के लिये क्या क्या छुपा हुआ है [अर्थात संतुष्टि] इस बात के पुरस्कार के तौर पर जो वह किया करते थे।" (क़ुरआन 32:17)

इन शारीरिक सुखों के अतिरिक्त, स्वर्ग अपने निवासियों को भावनात्मक और मानसिक आनंद की अनुभूति देगा, जैसा कि पैगंबर ने कहा है:

"जो भी स्वर्ग में प्रवेश करता है उसे एक आनंद भरा जीवन मिलता है; वह कभी दुखी अनुभव नहीं करेगा, उसके कपड़े कभी नहीं घिसेंगे, और उसका यौवन कभी भी समाप्त नहीं होगा। लोग एक दैविक आवाज़ सुनगे: 'मैं तुम्हें वरदान देता हूँ तुम स्वस्थ रहोगे और कभी बीमार नहीं पड़ोगे, तुम सदा जियोगे और कभी नहीं मरोगे, तुम सदा युवा रहोगे और कभी भी वृद्ध नहीं होगे, तुम आनंदमय रहोगे और कभी दुखी नहीं होगे।'"(सहीह मुस्लिम)

अंततः जो बात आंखों को सबसे अधिक आनंद देगी वह होगी ईश्वर के मुखमंडल का दर्शन। सच्चे आस्तिक के लिये, ईश्वर का यह धन्य दर्शन ऐसा है जैसे अंतिम पुरुस्कार जीत लिया हो।

"बहुत-से मुख उस दिन प्रफुल्ल होंगे, अपने ईश्वर को देखते हुए।" (क़ुरआन 75:22-23)

यही है स्वर्ग, शाश्वत घर और एक सच्चे आस्तिक का अंतिम पड़ाव। सबसे महान ईश्वर, हमें इस योग्य बनाए।



फ़ुटनोट:

[1] सहीह अल-जामी

[2] सहीह मुस्लिम

[3] मिशकात

[4] सहीह अल-बुखारी

[5] सहीह अल-जामी

[6] क़ुरआन 56:27-32

[7] सहीह अल-जामी

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 5): कब्र में नास्तिक 

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विवरण: एक नास्तिक के मृत्यु और निर्णय दिवस के बीच के जीवन का विवरण 

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 1638 (दैनिक औसत: 7)
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जैसे ही किसी दुष्ट नास्तिक की मृत्यु निकट आती है, उसे नरकाग्नि की गर्मी का कुछ अनुभव कराया जाता है। उसके साथ क्या होने वाला है इसका अनुभव उसे पृथ्वी पर दूसरा मौका दिए जाने की याचना करने के लिये विवश कर देता है ताकि वह कुछ अच्छा काम कर सके जो उसे जीते जी करना चाहिए था। पर अफ़सोस! उसकी याचना व्यर्थ जाएगी।

“जब, ऐसे किसी व्यक्ति की मृत्यु आती है, तो वह कहता है: ‘हे मेरे ईश्वर। मुझे जीवन वापस दे दें (पृथ्वी पर) ताकि मैं कुछ अच्छे काम कर सकूँ जिनकी मैंने उपेक्षा की।’ पर अब यह किसी तरह नहीं हो सकता! अब यह केवल एक कोरी इच्छा है जो यह व्यक्त कर रहा है। और ऐसे लोगों के सामने एक रुकावट है, (जो उन्हें वापस आने से रोकती है: कब्र के जीवन से) पुनर्जीवन के दिवस तक जब वे पुनर्जीवित होंगे।” (क़ुरआन 23:99-100).

दिव्य कोप का दंड दूर बैठे भयंकर रूप से कुरूप और काले देवदूतों द्वारा, उस दुष्ट आत्मा को सुना दिया जाता है:

    "अब उबलते हुए पानी, मवाद, और दूसरी बहुत सी, ऐसी यातनाओं का आनंद लो।" (इब्न मजाह, इब्न कथीर)

   आस्था न रखने वाली आत्मा अपने मालिक ईश्वर से मिलने को उत्सुक नहीं रहेगी, जैसा कि पैगंबर ने समझाया है:

    "जब एक नास्तिक की मृत्यु निकट आती है, तो उसे ईश्वर की यातना और उसके प्रतिदान का बुरा समाचार मिलता है, तब उसे अपनी हालत से अधिक घृणास्पद और कुछ नहीं लगता। इसीलिए, वह ईश्वर से मिलने को उत्सुक नहीं होता, और ईश्वर भी उससे मिलने को उत्सुक नहीं होता।" (सहीह अल-बुखारी)

    पैगंबर ने यह भी कहा:

    "जिसे भी ईश्वर से मिलने में खुशी होती है, ईश्वर को भी उससे मिलने में खुशी होती है, और जो भी ईश्वर से मिलने से नफरत करता है, ईश्वर भी उससे नहीं मिलना चाहता।" (सहीह अल-बुखारी)

   मृत्यु का देवदूत कब्र में नास्तिक के सर पर बैठता है और कहता है: "दुष्ट आत्मा, अल्लाह के कोप के लिये बाहर आ" और आत्मा को शरीर से बाहर खींच लेता है।

    "आप यदि ऐसे अत्याचारी को मरण की घोर दशा में देखते, जबकि स्वर्गदूत उनकी ओर हाथ बढ़ाये (कहते हैं:) अपने प्राण निकालो! आज तुम्हें इस कारण अपमानकारी यातना दी जायेगी कि तुम ईश्वर पर झूठ बोलते और उसकी छंदो को मानने से अभिमान करते थे।" (क़ुरआन 6:93)

"यदि आप उस दशा को देखते, जब स्वर्गदूत अविश्वासिओं के प्राण निकाल रहे थे, तो उनके मुखों और उनकी पीठों पर मार रहे थे तथा (कह रहे थे कि) दहन की यातना चखो।" (क़ुरआन 8:50) 

दुष्ट आत्मा बड़ी मुश्किल से शरीर छोड़ती है, मानो देवदूत उसे एक काँटेदार पेंचकस से किसी गीली ऊन में से निकाल रहे हों।[1]  मृत्यु का देवदूत तब आत्मा को पकड़ लेता है और बालों से बने एक बोरी में रख देता है जिससे सड़ी हुई बदबू आती है, ऐसी बदबू जो पृथ्वी पर किसी सड़ती हुई लाश में पाई जाती है। देवदूत तब उसे देवदूतों की दूसरी टोली के पास ले जाते हैं, जो पूछती है: "यह दुष्ट आत्मा किसकी है" जिसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं: "फलां फलां, फलां फलां का बेटा" - इतने खराब नामों का प्रयोग करते हैं जो उसके लिये पृथ्वी पर भी न कहे गए होंगे। उसके बाद, जब वह निचले स्वर्ग में लाया जाता है, तो विनती की जाती है कि उसके लिये द्वार खोला जाए, लेकिन विनती ठुकरा दी जाती है। पैगंबर इन घटनाओं का वर्णन करते हुए जब इस स्थान पर पहुँचे , तो वह बोले: 

"स्वर्ग के द्वार इनके लिये नहीं खोले जाएंगे और वे स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकेंगे जब तक कि कोई ऊंट सुइं की नोक से न निकल जाए।" (क़ुरआन 7:40)

ईश्वर कहेगा: "उसकी पुस्तक को सबसे निचली धरती की सिज्जीन में रख दिया जाए।"

…और उसकी आत्मा को नीचे उतार दिया जाता है। इस समय, पैगंबर (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने कहा:   

"जो अल्लाह के और भी साथी होने की बात करता है उसकी हालत ऐसे हो जाती है जैसे वह स्वर्ग से गिरा हो और बीच में पक्षियों द्वारा लपक लिया गया हो या हवा द्वारा किसी दूर स्थान पर फेंक दिया गया हो।" (क़ुरआन 22:31)

दुष्ट आत्मा को तब वापस शरीर में डाल दिया जाता है और दो खूंखार, डरावने देवदूत, मुनकर और नकीर, उससे पूछताछ करने आते हैं। उसे बैठाकर, पूछते हैं:  

मुनकर और नकीर: "तुम्हारा ईश्वर कौन है?"

नास्तिक आत्मा: "अफ़सोस, अफ़सोस, मैं नहीं जानता।"

मुनकर और नकीर: "तुम्हारा धर्म क्या है?"

नास्तिक आत्मा: "अफ़सोस, अफ़सोस, मुझे नहीं पता।"

मुनकर और नकीर: "तुम इस आदमी (मुहम्मद) के बारे में क्या जानते हो?"

नास्तिक आत्मा: "अफ़सोस, अफ़सोस, मुझे नहीं पता"

अपनी परीक्षा में अनुत्तीर्ण  होने के बाद, नास्तिक के सर पर लोहे का एक हथौड़ा मारा जाएगा, इतनी ताकत से कि एक पहाड़ भी चूर चूर हो जाए। उसकी चीत्कार स्वर्ग तक सुनाई देगी: "उसने झूठ बोला, उसके लिये नरक में कालीन बिछा दिया जाए, और नरक में उसके लिये द्वार खोल दिया जाए।"[2]  कब्र के फ़र्श पर नरक की कुछ तेज़ आग जला दी जाती है, और उसकी कब्र को इतना छोटा कर दिया जाता है कि उसके शरीर के कुचले जाने से उसकी पसलियाँ एक दूसरे में ऐंठ जाती हैं।[3] उसके बाद, एक अत्यंत बदसूरत, गंदे कपड़े पहने हुए और बहुत घिनौनी और अप्रिय बदबू छोड़ने वाली हस्ती उस नास्तिक आत्मा के पास आती है और कहती है: "जो तुम्हें नापसंद है उसका शोक मनाओ, क्योंकि इसी दिन का तुमसे वायदा किया गया था।" नास्तिक पूछेगा"तुम कौन हो, जिसका चेहरा इतना बदसूरत है और जो इतनी दुष्ट है?" बदसूरत हस्ती उत्तर देगी: "मैं तुम्हारे दुष्ट काम हूँ!" नास्तिक को तब आत्मग्लानि का अनुभव कराया जाता है, उसे स्वर्ग का वह घर दिखाकर जहां वह रहता -अगर उसने सच्चा जीवन बिताया होता- और फिर हर सुबह शाम उसे एक द्वार से नरक में होने वाला उसका असली घर दिखाया जाता है।[4] अल्लाह अपनी पुस्तक में कहते हैं कि फिरौन के लोग कितने दुष्ट हैं, जो इस समय अपनी कब्रों में नरक का दृश्य देखने की यातना सह रहे हैं:

"अग्नि: 'उन्हें इसका सामना करना पड़ता है, सुबह और दोपहर, और उस दिन जब वह घड़ी आएगी (तब देवदूतों से कहा जाएगा): ‘(अब) फिरौन के लोगों को सबसे अधिक यातना दो" (क़ुरआन 40:46)

भय और घृणा, चिंता और निराशा से परेशान, नास्तिक अपनी कब्र में पूछता रहेगा: "मेरे ईश्वर, अंतिम घड़ी न लाएँ, अंतिम घड़ी न लाएँ।"

पैगंबर के साथी ज़ैद बी. थाबित ने बताया, जब मुहम्मद और उनके साथी कई ईश्वरों को मानने वालों की कब्रों के पास से गुजर रहे थे, तब पैगंबर का घोड़ा बिदक गया और वह गिरते गिरते बचे। पैगंबर (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने कहा:  

"इन लोगों को कब्र में यातना दी जा रही है, और यदि तुम अपने मरे हुओं को कब्र में दफनाना न छोड़ दो, तो मैं ईश्वर से विनती करूंगा कि वह तुम्हें कब्र के इस दंड को सुनने दें जो मैं (और यह घोडा) सुन पा रहा हूँ।" (सहीह मुस्लिम)





फ़ुटनोट: 

[1] अल-हकीम, अबु दावूद और अन्य 

[2] मुसनद अहमद

[3] मुसनद अहमद

[4] इब्न हिब्बन 

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 6): निर्णय के दिन नास्तिक 

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विवरण: निर्णय दिवस पर नास्तिक पर चलने वाले कुछ मुकदमे 

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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पुनर्जीवन के महान दिन पर पुनर्जीवित लोगों पर एक बड़ी विपदा आएगी: 

"…ईश्वर उन्हें उस दिन के लिए टाल रहा है, जिस दिन उनकी आँखें खुली रह जायेँगी (भय से)।" (क़ुरआन 14:42)

नास्तिक को उसकी 'कब्र' से इस तरह पुनर्जीवित किया जाएगा जैसा ईश्वर ने वर्णन किया है: 

" उस दिन वे तेजी से कब्र से बाहर निकलेंगे, मानो वह एक खड़ी हुई मूर्ति की तरफ भागे जा रहे हैं। उनकी आँखें झुकी होंगी, और अपमान उन्हें ढक लेगा। उनसे इसी दिन का वायदा किया गया था।" (क़ुरआन 70:43-44)

उनका हृदय कांप रहा होगा, व्याकुल होगा यह सोचकर कि उनके साथ क्या बुरा होने वाला है:

"और (दूसरे) चेहरों पर, उस दिन, धूल होगी। उनपर कालिमा छाई होगी। वे नास्तिक हैं, दुष्ट लोग।" (क़ुरआन 80:40-42)

"और तुम कदापि ईश्वर को, उससे अचेत न समझो, जो अत्याचारी कर रहे हैं! वह तो उन्हें उस दिन के लिए टाल रहा है, जिस दिन आँखें खुली रह जायेँगी। वे दौड़ते हुए अपने सिर ऊपर किये हुए होंगे, उनकी आँखें उनकी ओर नहीं फिरेंगी और उनके दिल गिरे हुए होंगे।" (क़ुरआन 14:42)

ईश्वर को न मानने वालों को जिस हालत में वे पैदा हुए थे उसमें एकत्र किया जाएगा - नंगे  और खतना विहीन- एक बड़े मैदान में, मुँह के बल, अंधे, बहरे, और गूंगे:  

"हम उन्हें पुनर्जीवन के दिन एकत्र करेंगे मुँह के बल (गिरे हुए) – नेत्रहीन, गूंगे और बहरे। उनका आश्रय नरक होगा; जब भी कुछ कम होने लगेगी हम नरक की आग को और बढ़ा देंगे।" (क़ुरआन 17:97)

"और जो भी मेरी याद से निकल जाएगा – वाकई, वह एक निराश जीवन बिताएगा, और हम उसे पुनर्जीवन के दिन नेत्रहीन इकट्ठा करेंगे।" (क़ुरआन 20:124)

ईश्वर से वह 'तीन' बार मिलेंगे। पहली बार तब जब वे अपने आप को सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने अपने आपको बचाने के लिये व्यर्थ के तर्क देंगे, कुछ ऐसा कहेंगे: "पैगंबर हमारे पास आए ही नहीं !" हालांकि अल्लाह ने अपनी पुस्तक में लिखा है:

"…और हम कभी दंड नहीं देंगे जब तक हम कोई पैगंबर न भेजें।" (क़ुरआन 17:15)

"…वरना तुम कहोगे: ‘कोई हमारे पास खुशखबरी लेकर आया ही नहीं और कोई चेतावनी भी नहीं दी ..." (क़ुरआन 5:19)

दूसरी बार, वह अपनी गलती स्वीकार करेंगे लेकिन बहाने बनाएंगे। शैतान भी लोगों को बर्बाद करने के अपराध से बचने का प्रयत्न करते हैं:

"उसके साथी (शैतान) ने कहाः हे हमारे पालनहार! मैंने इसे कुपथ नहीं किया, परन्तु, वह स्वयं दूर के कुपथ में था।" (क़ुरआन 50:27)

परंतु सबसे महान और न्यायप्रिय ईश्वर इसे नही मानेंगे। वह कहेंगे: 

"मुझसे बहस मत करो। मैंने इस खतरे से तुम्हें पहले ही आगाह कर दिया था। मेरा दिया हुआ दंड बदला नहीं जा सकता I और मैं गुलामों के प्रति अन्यायी (बिल्कुल) नहीं हूँ।" (क़ुरआन 50:28-29)

तीसरी बार वह चालाक आत्मा अपने निर्माता से अपने कर्मों की पुस्तक (एक कर्म लेख जिसमें कुछ भी नहीं छूटता) लेने के लिये मिलेगा [1]।    

"और कर्म लेख (सामने) रख दिये जायेंगे, तो आप अपराधियों को देखेंगे कि उससे डर रहे हैं, जो कुछ उसमें (अंकित) है तथा कहेंगे कि हाय हमारा विनाश! ये कैसी पुस्तक है, जिसने किसी छोटे और बड़े कर्म को नहीं छोड़ा है, परन्तु उसे अंकित कर रखा है? और जो कर्म उन्होंने किये हैं, उन्हें वह सामने पायेंगे और आपका पालनहार किसी पर अत्याचार नहीं करेगा।" (क़ुरआन 18:49)

 दुष्ट आत्माओं को जब कर्म लेख मिल जाएंगे, तो उन्हें समूची मानव जाति के सम्मुख फटकारा जाएगा। 

"और उनको तुम्हारे मालिक के आगे पंक्तिबद्ध लाया जाएगा, (और वह कहेंगे), ‘तुम बिल्कुल वैसे ही हमारे सामने आए हो, जैसा हमने तुम्हें पहली बार बनाया था।’ लेकिन  तुमने तो दावा किया कि तुम्हें कभी हमसे मिलना नहीं पड़ेगा!" (क़ुरआन 18:48)

पैगंबर मुहम्मद ने कहा: "ये वे हैं जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे !"[2]  और इन्हीं से ईश्वर प्रश्न करेगा कि उन्होंने ईश्वर के आशीर्वाद को अनावश्यक क्यों समझा। हर एक से पूछा जाएगा: ‘क्या तुमने सोचा था हम मिलेंगे?’ और जब हर कोई कहेगा: ‘नहीं !’ ईश्वर उनसे कहेगा: ‘मैं भी तुम्हें भूल जाऊँगा जैसे तुम मुझे भूल गए!’[3] तब, जब नास्तिक झूठ बोलकर बचने का प्रयास करेगा, ईश्वर उसका मुँह सीलबंद कर देगा, और उसके शरीर के अन्य भाग उसके विरुद्ध गवाही देंगे। 

"उस दिन, हम उनके मुँह को सील कर देंगे, और उनके हाथ हमसे बात करेंगे, और उनके पैर हमें बताएंगे कि वह क्या करते थे।" (क़ुरआन 36:65)

अपने पापों के साथ साथ, नास्तिक उन दूसरे लोगों के पापों का भागीदार होगा जिनको उसने गुमराह किया। 

"और जब उनसे पूछा जाये कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है?  तो कहते हैं कि पूर्वजों की कल्पित कथाएँ हैं। ताकि वे अपने (पापों का) पूरा बोझ प्रलय के दिन उठायें तथा कुछ उन लोगों का बोझ (भी), जिन्हें बिना ज्ञान के कुपथ कर रहे थे, सावधान! वे कितना बुरा बोझ उठायेंगे।" (क़ुरआन 16:24-25)

अभाव, अकेलापन और परित्याग का भावनात्मक दर्द शारीरिक पीड़ा देगा। 

"…और ईश्वर पुनर्जीवन के दिन न उनसे बात करेंगे न उनकी ओर देखेंगे, वह उनका शुद्धिकरण भी नहीं करेंगे; और उनको कष्टदायक दंड मिलेगा।" (क़ुरआन 3:77)

पैगंबर मुहम्मद आस्तिकों का पक्ष लेंगे, लेकिन नास्तिकों को कोई मध्यस्थ नहीं मिलेगा; उन्होंने केवल एक सच्चे ईश्वर के साथ गलत देवताओं की भी पूजा की।[4]

"…और गलत काम करने वालों को कोई रक्षक या सहायता करने वाला नहीं मिलेगा।" (क़ुरआन 42:8)

उनके संत और आध्यात्मिक सलाहकार अपने को अलग कर लेंगे और नास्तिक चाहेगा कि काश वह अपने पुराने जीवन में वापस आ जाएं और उनसे अपने को वैसे ही अलग कर लें जैसा कि उन्होंने अब उनके साथ किया है:

"तथा जो अनुयायी होंगे, वे ये कामना करेंगे कि एक बार और हम संसार में जाते, तो इनसे ऐसे ही विरक्त हो जाते, जैसे ये हमसे विरक्त हो गये हैं! ऐसे ही ईश्वर उनके कर्मों को उनके लिए संताप बनाकर दिखाएगा और वे अग्नि से निकल नहीं सकेंगे।" (क़ुरआन 2:167)

पाप ग्रसित आत्मा का दुख इतना गहरा होगा कि वह वाकई में यह प्रार्थना करेगा: ‘हे ईश्वर, मुझ पर दया करें और मुझे आग में डाल दें।’[5] उससे पूछा जाएगा: ‘क्या तुम्हारी इच्छा है कि तुम्हारे पास पृथ्वी जितना सोना होता ताकि उसे देकर तुम यहाँ से मुक्ति पा सकते?’ इसके उत्तर में वह कहेगा: ‘हाँ’  जिस पर उसे बताया जाएगा कि: ‘तुम्हें इससे कहीं अधिक सरल काम दिया गया था - केवल ईश्वर की पूजा करना।’[6]

"और उन्हें और कोई निर्देश नहीं दिया गया था सिवाय इसके कि वे [केवल] अल्लाह  की पूजा करें, अपने ईमानदार धर्म (इस्लाम) के प्रति वफादार रहें..." (क़ुरआन 98:5)

"लेकिन नास्तिक – उनके काम रेगिस्तान में मृगतृष्णा की तरह हैं जिसे वह पानी समझते हैं, जब वे वहाँ जाते हैं वहाँ कुछ नहीं मिलता, लेकिन वह अपने सामने ईश्वर को पाते हैं, जो उन्हें उनका पूरा प्रतिदान देगा; और ईश्वर लेखा जोखा रखने में बहुत तत्पर हैं।" (क़ुरआन 24:39)

"और हम देखेंगे कि उन्होंने क्या काम किए हैं, और उन्हें ऐसे हटा देंगे जैसे धूल।" (क़ुरआन 25:23)

नास्तिक को तब पीछे से उसके बाएँ हाथ में, उसका लिखित लेखा जोखा दिया जाएगा जिसे देवदूतों ने बनाकर रखा था और उसके सांसारिक जीवन में उसके हर काम को लिखा करते थे।  

"जहाँ तक उसकी बात है जिसे उसका कर्म लेख बाएँ हाथ में दिया गया है, वह कहेगा: ‘ओह, कितना अच्छा होता मुझे यह दस्तआवेज दिया ही नहीं जाता, और मुझे अपने लेख जोख का पता न चलता।" (क़ुरआन 69:25-26)

"जहाँ तक उसकी बात है जिसे उसका कर्म लेख पीठ पीछे से दिया गया है, वह अपने विनाश के लिये चिल्लाएगा।" (क़ुरआन 84:10-11)

अंत में, उसे नरक में प्रवेश कराया जाएगा:

"तथा जो अविश्वासी होंगे वो हाँके जायेंगे नरक की ओर झुण्ड बनाकर। यहाँ तक कि जब वे उसके पास आयेंगे, तो खोल दिये जायेंगे उसके द्वार तथा उनसे कहेंगे उसके रक्षक (स्वर्गदूत) क्या नहीं आये तुम्हारे पास रसूल तुममें से, जो तुम्हें सुनाते, तुम्हारे पालनहार के छंद तथा सचेत करते तुम्हें, इस दिन का सामना करने से? वे कहेंगेः क्यों नहीं? परन्तु, सिध्द हो गया यातना का शब्द, अविश्वासिओं पर।’' (क़ुरआन 39:71)

नरक में सबसे पहले मूर्तिपूजक जाएंगे, उसके बाद यहूदी और ईसाई जिन्होंने पैगंबरों के सच्चे धर्म को भ्रष्ट कर दिया।[7]  कुछ नरक में ले जाए जाएंगे, कुछ उसमें गिर जाएंगे, और अंकुड़ा (हुक) से पकड़े जाएंगे।[8] इस समय नास्तिक की इच्छा होगी कि वह मिट्टी बन जाए, ताकि अपने बुरे कामों के कड़वे फल न भुगतने पड़ें।  

"वाकई, हमने तुम्हें इस दिन दंड मिल सकने के बारे में आगाह किया था जब एक मनुष्य देखेगा कि उसके हाथ में क्या है और तब नास्तिक कहेगा: 'ओह, काश कि मैं मिट्टी होता!’ (क़ुरआन 78:40)







फ़ुटनोट :

[1] इब्न मजाह, मसनद, और अल- तिर्मिज़ी  

[2] सहीह मुस्लिम 

[3] सहीह मुस्लिम 

[4] सहीह अल -बुखारी 

[5] तबरानी 

[6] सहीह अल -बुखारी 

[7] सहीह अल -बुखारी 

[8] अल- तिर्मिज़ी 

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 7): नास्तिक और नरक

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विवरण: नरक की आग नास्तिकों का स्वागत कैसे करेगी।                          

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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नरक अपनी कोप गर्जना के साथ नास्तिक का स्वागत करेगा:

"…और हमने उन लोगों के लिये जो इस दिन को नहीं मानते एक भीषण आग जलायी है। जब वह [नरक की आग] उन्हें दूर से देखेगी, वे उसके कोप और गर्जना को सुनेंगे।" (क़ुरआन 25:11-12)

जब वे उसके पास आएंगे, वे अपनी बेड़ियां महसूस करेंगे और खुद को उसका ईंधन समझेंगे

"निस्संदेह, हमने नास्तिकों के लिये बेड़ियाँ और जंजीरें और आग तैयार की हैं।" (क़ुरआन 76:4)

"निस्संदेह, हमारे पास बेड़ियाँ और जलती हुई आग है।" (क़ुरआन 73:12)

ईश्वर के आदेश पर देवदूत दौड़ कर उन्हें पकड़ लेंगे और बेड़ियों से बांध देंगे:

"पकड़ लो और बांध दो।" (क़ुरआन 69:30)

"…और जो नास्तिक होंगे हम उनकी गर्दन में जंजीर डाल देंगे।" (क़ुरआन 34:33)

जंजीरों से बांध कर…

"…एक जंजीर जिसकी लंबाई सत्तर हाथ है।" (क़ुरआन 69:32)

…उसे खींचा जाएगा:

"जब गर्दन के चारों ओर लोहे के गलेबंद, और जंजीरें होंगी, उन्हें घसीटा जाएगा।" (क़ुरआन 40:71)

जिस समय उन्हें जंजीरों से बांध कर घसीटा जाएगा और नरक में फेंक दिया जाएगा, वे उसके क्रोध को देखेंगे: 

"और जिन्होंने अपने पालनहार में विश्वास नहीं किया उनके लिये नरक का दंड है, और एक घृणास्पद गंतव्य है। जब उन्हें वहाँ फेंका जाएगा, वे वहाँ एक [भयानक] साँस लेने की आवाज़ सुनेंगे जो खौलने लगेगी। क्रोध से जैसे फट जाएगी..." (क़ुरआन 67:6-8)

चूंकि उन्हें एक बड़े मैदान से लाया जाएगा जहाँ वे एकत्र हुए थे, नंगे और भूखे, वे स्वर्ग के निवासियों से पानी की भीख मांगेंगे:

"तथा नरकवासी स्वर्गवासियों को पुकारेंगे कि हमपर तनिक पानी डाल दो अथवा जो ईश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है, उसमें से कुछ दे दो। वे कहेंगे कि ईश्वर ने ये दोनों अविश्वासिओं के लिए वर्जित कर दिया है।" (क़ुरआन 7:50)

उस समय आस्थावान लोगों का स्वर्ग में आदर से स्वागत किया जाएगा, उन्हें आराम दिया जाएगा, और स्वादिष्ट दावत दी जाएगी, नास्तिक लोग नरक में भोजन करेंगे:   

"तब तुम, आवारा, नास्तिक लोग, ज़क्कुम के पेड़ों से खाओगे और उससे अपना पेट भरोगे। " (क़ुरआन 56:51-53)

ज़क्कुम: एक पेड़ जिसकी जड़ें नरक के तल में हैं; उसके फल शैतानों के सिर जैसे दिखते हैं: 

"उसका (स्वर्ग) सत्कार अच्छा है या ज़क्कुम के पेड़ का? निस्संदेह, हमने गलतियाँ करने वालों को कष्ट देने के लिए बनाया है। निस्संदेह, यह नरकाग्नि के तल से निकलता है, इसके फल ऐसे होते हैं जैसे शैतान के सिर। और निस्संदेह, ये उसी से खाएंगे और अपना पेट भरेंगे।" (क़ुरआन 37:62-66)

दुष्ट लोग कुछ और भी खाएंगे, कुछ ऐसा जिससे गला बंद हो जाए, और कुछ ऐसा जैसे सूखी, काँटेदार झाड़ियाँ।[2]

"और न ही कोई दूसरा भोजन सिवाय (बदबूदार) मवाद से बना; इसे कोई नहीं खाएगा सिवाय पापियों के।" (क़ुरआन 69:36-37)

और इस दयनीय भोजन को पेट में नीचे डालने के लिये, उनके अपने पस, खून, पसीना और मवाद से मिश्रित एक बहुत ही ठंडा द्रव [3] होगा, साथ ही उबलता हुआ, जला देने वाला पानी जो उनकी अंतड़ियों को घोल देगा:

"…और उन्हें जला देने वाला पानी पीने को दिया जाता है जो उनकी अंतड़ियों को काट देता है।" (क़ुरआन 47:15)

नरक में रहने वालों के कपड़े आग और तारकोल से बने होंगे:

"...और जो नास्तिक होंगे उनके कपड़े आग से बनाए जाएंगे।" (क़ुरआन 22:19)

"उनके पिघले हुए तारकोल से बने कपड़े और उनके चेहरे आग से ढके होंगे।" (क़ुरआन 14:50)

उनकी चप्पलें, [4] बिस्तर, और आशियाने भी इसी तरह आग से बने होंगे; [5] एक ऐसा दंड मिलेगा जो सारे शरीर के लिये होगा, लापरवाह सिर से लेकर पापी पैर के अंगूठे तक: 

"तब उसके सिर पर जला देने वाला पानी डाला जायेगा।" (क़ुरआन 44:48)

"उस दिन उनका दंड उन्हें ऊपर से लेकर पैरों के नीचे तक पूरा मिलेगा और यह कहा जाएगा: ‘तुम जो करते थे अब उसका फल भुगतो।" (क़ुरआन 29:55)

नरक में उनके दंड उनके अविश्वास और उनके पापों के अनुसार होगा। 

"किसी तरह नहीं! उसे कोल्हू में अवश्य फेंका जाएगा। और तुम कैसे जान पाओगे कि कोल्हू क्या है? यह ईश्वर की अग्नि है, [अनंत काल] तक जलती है, जो दिलों तक पहुँचती  है. निस्संदेह, यह [नरक की अग्नि] उनके पास लाई जाएगी। एक के बाद एक कतारों में।" (क़ुरआन 104:5-9)

हर बार त्वचा जलेगी, और हर बार उसे फिर से ठीक कर दिया जाएगा:

"निस्संदेह, जो हमारे छंदो में विश्वास नहीं करते – हम उन्हें आग में धकेल देते हैं। हर बार जब उनकी त्वचा भुनती है, हम उसे दूसरी त्वचा से बदल देते हैं ताकि वे दंड भुगतें। निस्संदेह, ईश्वर सदैव महान और बुद्धिमान है।" (क़ुरआन 4:56)

सबसे बुरी बात यह कि दंड बढ़ता ही चला जाएगा। 

"तो भुगतो [दंड], और तुम्हारी यातना के अतिरिक्त हम तुम्हारे लिये और कुछ नहीं बढ़ाएंगे।" (क़ुरआन 78:30)

इस दंड का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भयंकर होगा। इस दंड का प्रभाव इतना भीषण होगा कि इसे भुगतने वाले चीत्कार कर उठेंगे कि जिन्होंने उनको गलत मार्ग पर डाला उनके लिये यह दंड कई गुना कर दिया जाए:

"वे कहेंगे: ‘हमारे ईश्वर, जिसके कारण हमारे साथ ऐसा हुआ है – उनके लिये आग में दुगुना दंड दिया जाए।" (क़ुरआन 38:61)

कुछ लोग भाग निकलने का पहला प्रयास करेंगे, लेकिन:

"और उनके लिये लोहे के हथौड़े हैं। जितनी बार वे व्याकुल होकर बाहर निकलने की कोशिश करेंगे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा, और [यह कहा जाएगा]: ‘धधकती आग का आनंद लो!" (क़ुरआन 22:21-22)

कई बार असफल होने के बाद, वे इबलीस (जो खुद एक बड़ा शैतान है) से सहायता मांगेंगे। 

"और शैतान कहेगा, जब निर्णय कर दिया जायेगाः वास्तव में, ईश्वर ने तुम्हें सत्य वचन दिया था और मैंने तुम्हें वचन दिया, तो अपना वचन भंग कर दिया और मेरा तुमपर कोई दबाव नहीं था, परन्तु ये कि मैंने तुम्हें (अपनी ओर) बुलाया और तुमने मेरी बात स्वीकार कर ली। अतः मेरी निन्दा न करो, स्वयं अपनी निंदा करो, न मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ और न तुम मेरी सहायता कर सकते हो। वास्तव में, मैंने उसे स्वीकार कर लिया, जो इससे पहले तुमने मुझे ईश्वर का साझी बनाया था। निःसंदेह अत्याचारियों के लिए दुःखदायी यातना है।" (क़ुरआन 14:22)

शैतान से निराश होकर, वे नरक की रक्षा करने वाले देवदूतों से विनती करेंगे कि उनके कष्ट को कुछ कम करवा दें, भले ही एक दिन के लिये:

"और अग्नि में पड़े वे लोग नरक के रक्षकों से कहेंगे: 'अपने मालिक से प्रार्थना करें कि [भले ही] एक दिन का दंड कम कर दें'।" (क़ुरआन 40:49)

ईश्वर के उत्तर की अनिश्चित प्रतीक्षा के बाद, रक्षक वापस आएंगे और पूछेंगे:

"‘क्या तुम्हारे संदेशवाहक तुम्हारे पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ नहीं आए थे? वे कहेंगे, 'हाँ।' वे [रक्षक] उत्तर देंगे: ‘तो स्वयं से प्रार्थना करो, लेकिन नास्तिकों की याचना कुछ नहीं है बल्कि निरर्थक (प्रयास) है।" (क़ुरआन 40:50)

  दंड कम हो पाने की आशा छोड़कर, वे मृत्यु चाहेंगे। इस बार वह नरक के मुख्य देवदूत मलिक से कहेंगे, और 40 साल प्रार्थना करेंगे:

"और वे पुकारेंगे: 'ओ मलिक, अपने ईश्वर से कहो हमारा अंत कर दें!..." (क़ुरआन 43:77)

हज़ार साल बाद उसका तल्ख उत्तर होगा: 

"…निस्संदेह, तुम यहीं रहोगे।" (क़ुरआन 43:77)

अंत में, वह उसकी ओर मुड़ेंगे जिसकी ओर मुड़ने से उन्होंने इस संसार में मना कर दिया था, एक आखिरी मौका देने के लिये:  

"वे कहेंगे, 'हमारे ईश्वर, हमारी जड़बुद्धि हम पर हावी हो गई थी, और हमारा पतन  हो गया था। हमारे ईश्वर, हमें यहाँ से हटाओ, और अगर हम फिर बुराई की ओर जाएँ, तो हम वाकई पापी होंगे।" (क़ुरआन 23:106-107)

ईश्वर का उत्तर यह होगा:

"वहीं उपेक्षित पड़े रहो और मुझसे बात मत करो।" (क़ुरआन 23:108)

इस उत्तर की पीड़ा उनकी भयंकर यातना से भी अधिक होगी। क्योंकि नास्तिक तब यह जान जाएगा कि नरक में उसका निवास अनंत काल तक रहेगा, स्वर्ग से उसका उन्मूलन अंतिम रूप से पक्का है:

"निस्संदेह, जो विश्वास नहीं करते और गलतियाँ करते हैं – उन्हें ईश्वर कभी क्षमा नहीं करेगा, न ही वह उन्हें नरक के मार्ग के अतिरिक्त और कोई मार्ग दिखाएगा; वे सदैव वहीं रहेंगे। और ईश्वर के लिये यह बहुत आसान है।" (क़ुरआन 4:168-169)

सबसे बड़ी हानि एक नास्तिक के लिये आध्यात्मिक होगी: उसका ईश्वर से पर्दा रहेगा और वह उसे देखने से वंचित रहेगा:

"नहीं ! निस्संदेह, अपने ईश्वर से, उस दिन, उनका विभाजन हो जाएगा।" (क़ुरआन 83:15)

जिस तरह उन्होंने इस जीवन में ईश्वर को 'देखने' से मना कर दिया, अगले जीवन में ईश्वर उनसे विमुख हो जाएगा। आस्थावान उनका मज़ाक उड़ाएंगे।   

"तो आज (क़यामत में) ईमानदार लोग काफ़िरों से हँसी करेंगे, (और) तख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगे कि अब तो काफ़िरों को उनके किए का पूरा पूरा बदला मिल गया।" (क़ुरआन 83:34-36)

उनके सम्पूर्ण दुख और निराशा का अंत तभी होगा जब मृत्यु एक मेढ़ा के रूप में उनके सामने लाई जाएगी और उनके सामने उसका वध किया जाएगा, ताकि उन्हें पता चल जाए कि अंतिम विलय में कोई शरण नहीं मिलेगी। 

"और उन्हें चेतावनी दो, (ओ मुहम्मद ), पश्चाताप के दिन की, जब मामले का अंतिम निर्णय होगा; और फिर भी वे बेध्यानी में हैं, और विश्वास नहीं करते!" (क़ुरआन 19:39)


फ़ुटनोट:

[1] क़ुरआन  72:13.

[2] क़ुरआन  88:6-7.

[3] क़ुरआन  78:24-25.

[4] सहीह मुस्लिम 

[5] क़ुरआन  7:41.

 

 

परलोक की यात्रा (8 का भाग 8): निष्कर्ष 

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विवरण: स्वर्ग और नरक का अस्तित्व होने के कुछ कारण। 

  • द्वारा Imam Mufti (co-author Abdurrahman Mahdi)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद, जिनकी मृत्यु 632 में हुई थी, उन्होंने कहा था: 

"यह संसार एक आस्तिक के लिये एक कारागार है, परंतु एक नास्तिक के लिये एक स्वर्ग है। जबकि एक नास्तिक के लिये परलोक कारागार है, एक आस्तिक के लिये वह उसका स्वर्ग होगा।" 

एक बार, इस्लाम के प्रारम्भिक काल में, एक निर्धन ईसाई की इस्लाम के एक महान विद्वान से भेंट हुई, जो उस समय अच्छे कपड़े पहने हुए एक बढ़िया घोड़े पर सवार था। ईसाई ने धनी मुस्लिम को ऊपर दी गई हदीस सुनाते हुए कहा: "फिर भी मैं, एक गैर-मुस्लिम, निर्धन और इस दुनिया में बेसहारा आपके सामने खड़ा हुआ हूँ, जबकि आप मुस्लिम हैं, धनी हैं और सम्पन्न हैं।" विद्वान ने उत्तर दिया: "निस्संदेह। लेकिन अगर तुम यह वास्तविकता जानते कि उस दुनिया में तुम्हें क्या मिलने वाला है (शाश्वत दंड), तो उसके तुलना में इस समय तुम अपने आप को  स्वर्ग में ही समझते। और अगर तुम यह वास्तविकता जानते कि उस दुनिया में मेरे लिये क्या है (अनंत आनंद), तो तुम उसकी तुलना में मुझे इस समय कारागार में ही समझोगे।"

  अतः, यह ईश्वर की महान करुणा और न्याय ही है जिसके कारण उसने स्वर्ग और नरक की स्थापना की। नरक की अग्नि का ज्ञान ही मनुष्य को गलत काम करने से रोकता है जबकि स्वर्ग की एक झलक उसे अच्छे काम करने और न्यायपूर्ण रहने के लिये प्रेरित करती है। जो अपने ईश्वर को मान नहीं देते, दुष्ट कार्य करते हैं और जिसका उनको पश्चाताप भी नहीं होता वे नरक में प्रवेश करेंगे: एक ऐसा स्थान जहाँ दारुण पीड़ा है और कष्ट हैं। जबकि न्यायपूर्ण रहने के लिये एक ऐसा स्थान पुरुस्कार में मिलता है जहाँ अकल्पनीय भौतिक सौन्दर्य और संपूर्णता है और यही ईश्वर का स्वर्ग है। 

अक्सर, लोग अपनी आत्मा के अच्छे होने का प्रमाण देने के लिये यह देते हैं कि वे जो भी अच्छा काम करते हैं वह केवल और केवल ईश्वर के प्रति अपने सच्चे प्रेम के कारण ही करते हैं या फिर एक सार्वभौमिक नैतिक और गुणों से भरपूर धार्मिक नियमों की संहिता के अनुसार जीने के लिये करते हैं, उन्हें किसी प्रलोभन या दंड की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन ईश्वर जब मनुष्य से क़ुरआन में कुछ कहते हैं, तो वह उसकी ढुलमुल आत्मा को जानते हुए कहते हैं। स्वर्ग की खुशियां वास्तविक, भौतिक, और अनुभव-योग्य हैं। मनुष्य स्वर्ग में मिलने वाले भोजन, कपड़े और घर जैसी असाधारण, असीमित और अनंत वस्तुओं  के आकर्षण को सही तरह से समझना आरंभ कर सकता है क्योंकि उसे पता है कि इस संसार में यह सब वस्तुएं कितना संतोष और सुख देती हैं।   

"लोगों के लिए उनके मन को मोहने वाली चीज़ें, जैसे स्त्रियाँ, संतान, सोने चाँदी के ढेर, निशान लगे घोड़े, पशुओं तथा खेती शोभनीय बना दी गई हैं। ये सब सांसारिक जीवन के उपभोग्य हैं और उत्तम आवास अल्लाह के पास है।" (क़ुरआन 3:14)

इसी तरह, इंसान यह समझना आरंभ कर सकता है कि नरक की अग्नि और उससे संबंधित वस्तुएं  कितनी दुखदायी और भयानक हो सकती हैं, क्योंकि उसे पता है कि इस संसार में अग्नि से जलना कितना कष्टप्रद होता है। इसलिए, मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा को, जैसा कि ईश्वर और उनके पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने विस्तार से बताया है, और कुछ नहीं बल्कि केवल एक ऐसे प्रोत्साहन की तरह ही काम करना चाहिए जिसके महान उद्देश्य को सारी मानवता निश्चय ही और सच में समझती है जो है: निश्चल प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ अपने निर्माता की पूजा और सेवा। आखिरकार, 

"...उनको इसके अतिरिक्त और कोई निर्देश नहीं था कि सिर्फ अल्लाह की पूजा करें, एक ईमानदार धर्म (इस्लाम) के प्रति निष्ठावान रहते हुए।" (क़ुरआन 98:5)

लेकिन, मानवजाति के उन असंख्य लोगों को जो, आदि काल से अपने ईश्वर और उसके बंदों के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते आए हैं, यह नहीं भूलना चाहिए कि: 

 "प्रत्येक प्राणी को मौत का स्वाद चखना है और तुम्हें, तुम्हारे कर्मों का प्रलय के दिन भरपूर प्रतिफल दिया जायेगा, तो (उस दिन) जो व्यक्ति नरक से बचा लिया गया तथा स्वर्ग में प्रवेश पा गया, तो वह सफल हो गया तथा सांसारिक जीवन धोखे की पूंजी के सिवा कुछ नहीं है।।"(क़ुरआन 3:185) 


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