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इस्लाम क़बूल करना (भाग 2 का 1): दुनिया के हर कोने में मौजूद लोगों के लिए एक धर्म

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  • द्वारा Aisha Stacey (© 2010 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 07 Mar 2022
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  • देखा गया: 656 (दैनिक औसत: 3)
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आज दुनिया में बहुत सारे लोग सच्चाई की तलाश कर रहे हैं; वे अपने जीवन के मायने तलाश करते हैं, और सोचते हैं कि आख़िर ज़िंदगी का मतलब क्या है। पुरुष एवं महिला सवाल करते हैं, मैं यहां क्यों हूं? दुख और पीड़ा के दौरान, मानवजाति चुपचाप या जोर से पुकार कर राहत या समझ की गुहार लगाता है। अक्सर सुख के दौरान, एक व्यक्ति इस तरह के उत्साह के स्रोत को समझने की कोशिश करता है। कभी-कभी लोग इस्लाम को अपना सच्चा धर्म मानने पर विचार करते हैं लेकिन उस बीच कुछ रुकावटें महसूस करते हैं।

जीवन के सबसे ख़ुशहाल पलों या सबसे बुरे वक्त में, एक व्यक्ति की सबसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया सर्व-शक्तिमान यानि ईश्वर के साथ जुड़ने का होता है। यहां तक कि जो लोग ख़ुद को नास्तिक या गैर-धार्मिक मानते हैं, उन्होंने भी अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर खुद को ईश्वर के बनाए शाश्वत व्यवस्था का हिस्सा होने की स्वाभाविक भावना का अनुभव किया है।

इस्लाम धर्म इस एक मूल विश्वास पर आधारित है कि ईश्वर एक है। वह अकेले ही ब्रह्मांड का पालनकर्ता और निर्माता है। उसका कोई भागीदार, बच्चा या सहयोगी नहीं है। वह सबसे दयालु, सबसे बुद्धिमान और सबसे न्याययुक्त है। वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला और सब कुछ जानने वाला है। वही शुरुआत है, वही आखिर है।

यह सोचकर सुकून मिलता है कि इस जीवन में हमारी आज़माइश, क्लेश और जीत एक क्रूर असंगठित लोगों के बेतरतीब कार्य नहीं हैं। ईश्वर पर भरोसा, एक ईश्वर पर भरोसा, दुनिया में जिस भी चीज़ का अस्तित्व है उसका पालनकर्ता और निर्माता वही है, ये मान्यताएं सभी का एक मौलिक अधिकार है। यह निश्चित रूप से जानना कि हमारा अस्तित्व एक सुव्यवस्थित दुनिया का हिस्सा है और यह कि जीवन जैसा होना चाहिए वैसा ही दिखाई दे रहा है, यह एक ऐसी अवधारणा है जो अमन और शांति लाती है।

इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो जीवन की ओर देखता है और कहता है कि यह दुनिया एक नश्वर जगह है और हमारे होने का कारण ईश्वर की आराधना करना है। सुनने में काफी सरल लगता है, है ना? ईश्वर एक है, इसे स्वीकार करें और उसकी आराधना करें जिससे अमन और शांति प्राप्त की जा सकती है। यह किसी भी इंसान की समझ में आता है और इसे ईमानदारी से विश्वास करके प्राप्त किया जा सकता है कि ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है।

दुर्भाग्यवश इस निडरता भरी नई सदी में, हम सीमाओं को बढ़ाना जारी रखते हैं और दुनिया को उसकी महिमा में फिर से खोजते हैं लेकिन निर्माता को भूल गए हैं, और यह भी भूल गए हैं कि जीवन असल में आसान होना था। अगर हमें शांति से रहना है और दर्द, मानसिक उथल-पुथल और दुख की बेड़ियों को तोड़ना है, तो ईश्वर के साथ अपना संबंध खोजना और उसके साथ संबंध स्थापित करना सर्वोपरि है।

इस्लाम दुनिया के हर कोने में मौजूद सभी लोगों के लिए हर समय के लिए है। यह पुरुषों के लिए या किसी विशेष जाति या जातीयता के लिए नहीं आया था। यह क़ुरआन में मिली शिक्षाओं और पैगंबर मुहम्मद की प्रामाणिक परंपराओं के आधार पर जीवन का एक संपूर्ण सार है। एक बार फिर, सुनने में काफी सरल लगता है, है ना? निर्माता ने अपनी रचना के लिए मार्गदर्शन प्रकट किया। यह इस जीवन और अगले जीवन दोनों में अनंत काल तक सुख प्राप्त करने की एक अचूक योजना है।

क़ुरआन और प्रामाणिक परंपराएं ईश्वर के अवधारणा की व्याख्या करती हैं और इस बात का विवरण देती हैं कि क्या हलाल है और क्या हराम है। वे अच्छे शिष्टाचार और नैतिकता की मूल बातें समझाते हैं, और इबादत को लेकर नियम प्रदान करते हैं। वे नबियों और हमारे धर्मी पूर्ववर्तियों के बारे में कहानियां सुनाते हैं, और स्वर्ग और नर्क का वर्णन करते हैं। यह मार्गदर्शन पूरी मानव जाति के लिए पेश किया गया था, और स्वयं ईश्वर कहता है कि वह मानव जाति को कठिनाई में नहीं डालना चाहते हैं।

“ईश्वर नहीं चाहता है कि वह तुम पर कोई कठिनाई डाले, बल्कि वह चाहता है कि तुमको पवित्र करे और तुम पर अपनी कृपा पूरी करे ताकि तुम आभार प्रकट करने वाले बनो।” (क़ुरआन 5:6)

जब हम ईश्वर से बात करते हैं, तो वह सुनता है और जवाब देता है और सच्चाई जो कि इस्लाम है, एक ईश्वर का होना, यह ज़ाहिर करता है। यह सब सुनने में सरल लगता है, और पेचीदा नहीं होना चाहिए, लेकिन दुख की बात है कि हम, मानव जाति चीज़ों को कठिन बना देते हैं। हम जिद्दी हैं फिर भी ईश्वर लगातार हमारे लिए रास्तों से अड़चनों को हटाता है।

इस्लाम को एक सच्चे धर्म के रूप में क़बूल करना सरल होना चाहिए। ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है। उस कथन से अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है? कम पेचीदा जैसा कुछ भी नहीं है, लेकिन कभी-कभी आस्था प्रणाली को फिर से परिभाषित करने की संभावना पर विचार करना डरावना और बाधाओं से भरा हो सकता है। जब कोई व्यक्ति इस्लाम को अपने पसंदीदा धर्म के रूप में क़बूल करता है तो वे अक्सर इसे क़बूल न करने के कारणों से उभरते हैं कि उनका दिल जो उन्हें बता रहा है वह सच है।

फ़िलहाल, इस्लाम की सच्चाई उन नियमों और विनियमों से धुंधली हो गई है जिन्हें पूरा करना लगभग असंभव प्रतीत होता है। मुसलमान शराब नहीं पीते, मुसलमान सूअर का मांस नहीं खाते, मुस्लिम महिलाओं को स्कार्फ़ पहनना चाहिए, मुसलमानों को हर दिन पांच बार नमाज़ अदा करनी चाहिए। पुरुष और महिलाएं खुद को ऐसी बातें कहते हुए पाते हैं, "मैं संभवतः शराब पीना बंद नहीं कर सकता", या "मेरे लिए हर दिन अकेले पांच बार नमाज़ करना बहुत मुश्किल होगा"।

हालांकि सच्चाई यह है कि एक बार जब एक व्यक्ति ने स्वीकार कर लिया कि ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है और उसके साथ एक संबंध विकसित करना है तो नियम और कानून महत्वहीन हो जाते हैं। यह ईश्वर को ख़ुश करने की एक धीमी प्रक्रिया है। कुछ लोगों के लिए अच्छे जीवन के लिए दिशा-निर्देशों को स्वीकार करना कुछ दिन, घंटों तक का मामला होता है, मगर दूसरों के लिए यह कुछ हफ़्ते, महीने या साल भी हो सकता है। इस्लाम में प्रत्येक व्यक्ति का सफ़र अलग है। प्रत्येक व्यक्ति अनोखा है और प्रत्येक व्यक्ति का ईश्वर से संबंध एक विशिष्ट परिस्थितियों के ज़रिए होता है। एक सफ़र दूसरे से ज़्यादा सही नहीं है।

बहुत से लोग मानते हैं कि उनके पाप बहुत बड़े हैं और अक्सर होते रहे हैं जिन्हें ईश्वर कभी माफ नहीं कर सकता। वे जो जानते हैं वह सच है, यह स्वीकार करने में वे हिचकिचाते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि वे ख़ुद को नियंत्रित नहीं कर पाएंगे और पाप या अपराध करना छोड़ देंगे। हालांकि इस्लाम धर्म माफ़ करने का धर्म है और ईश्वर अक्सर माफ़ कर देता है। भले ही मानव जाति के पाप कितना ही बढ़ जाए, ईश्वर माफ़ करेगा और तब तक माफ़ करता रहेगा जब तक हमारी क़यामत की घड़ी हमारे नज़दीक नहीं आ जाती।

अगर कोई व्यक्ति वाकई ये मानता है कि ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है, तो उसे बिना देर किए इस्लाम क़बूल कर लेना चाहिए। यहां तक कि अगर उसे लगता है कि वह पाप करना जारी रखेगा, या फिर इस्लाम के कुछ पहलू हैं जिसे वे पूरी तरह से नहीं समझते हैं। एक ईश्वर में विश्वास इस्लाम में सबसे मौलिक विश्वास है और एक बार जब कोई व्यक्ति ईश्वर के साथ संबंध स्थापित कर लेता है तो उसके जीवन में बदलाव होंगे; वैसे बदलाव जो कभी अनुभव नहीं किया होगा।

अगले लेख में, हम सीखेंगे कि माफ़ न करने योग्य केवल एक पाप है और वह ईश्वर सबसे रहमदिल, दयालु है।

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