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इस्लाम में मोक्ष (3 का भाग 1): मोक्ष क्या है?

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विवरण: सच्ची पूजा से मोक्ष प्राप्त करें 

  • द्वारा Aisha Stacey (© 2010 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 385 (दैनिक औसत: 5)
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इस्लाम यह शिक्षा देता है कि मोक्ष की प्राप्ति केवल ईश्वर की प्रार्थना से ही संभव है। व्यक्ति को ईश्वर पर विश्वास करना चाहिए और उसके निर्देशों का पालन करना चाहिए। यही संदेश मूसा और यीशु सहित सभी पैगंबरों ने दिया है। वह केवल एक ही है जो पूजा के योग्य है। एक ईश्वर, बिना किसी साथी, पुत्रों, या पुत्रियों के। मोक्ष और उससे अनत सुख की प्राप्ति सच्ची पूजा से ही प्राप्त की जा सकती हैं।

इसके अतिरिक्त इस्लाम यह शिक्षा भी देता है कि मनुष्य पाप रहित पैदा होता है और इसलिए उसका स्वाभाविक झुकाव केवल ईश्वर की पूजा ही है (बिना किन्हीं मध्यस्थों के)। इस पापरहित अवस्था को बनाए रखने के लिये मनुष्य जाति को ईश्वर के निर्देशों का पालन करना चाहिए और एक सच्चा न्यायप्रिय जीवन बिताने का प्रयत्न करना चाहिए। अगर हम पाप में लिप्त हो जाएँ, तो केवल एक उपाय है कि हम सच्चे मन से पश्चाताप करें और फिर ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना करें। जब कोई व्यक्ति पाप करता है तो वह अपने आप को ईश्वर की कृपा से दूर कर देता या कर देती है, लेकिन सच्चा पश्चाताप उसे वापस ईश्वर के पास ले आता है। 

मोक्ष एक शक्तिशाली शब्द है जिसे शब्दकोश में बचाव होना या विनष्ट होने, किसी कठिनाई, या किसी बुराई से मुक्ति पाने के अर्थ में परिभाषित किया गया है। धर्म की दृष्टि से इसका अर्थ पाप और उसके दुष्परिणामों से रक्षा है। विशेषकर, ईसाई धर्म में यह जीसस के पश्चाताप और मुक्ति से संबंधित है। इस्लाम में मोक्ष का अलग ही सिद्धांत है। इसमें यह नरक की अग्नि से मुक्ति है, जबकि यह ईसाई धर्म के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को अस्वीकार करता है और स्पष्ट रूप से कहता है कि मोक्ष उस सबसे कृपालु, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्थन से ही प्राप्त होता है।  

“जो ईश्वर का स्मरण करते हैं (सदैव, और प्रार्थनाओं में) खड़े हुए, बैठे हुए, और लेटे हुए, और गहराई से धरती और स्वर्ग के सृजन के बारे में सोचते हैं, (कहते हुए), "मेरे ईश्वर ! आपने यह (सब) व्यर्थ ही नहीं बनाए हैं, आपकी जय हो! (आप महान हैं उन सबसे जिन्हें वे आपके साथ साथी की तरह जोड़ते हैं )। हमें अग्नि की प्राणांतक पीड़ा से बचाएँ। ” (क़ुरआन 3:191)

  ईसाई मत के अनुसार, मनुष्य जाति को बिगड़ी हुई और पापग्रस्त माना गया है। मनुष्य के अस्तित्व के मूल में पाप होने सिद्धांत कहता है कि मनुष्य जाति पहले ही आदम के पाप से कलंकित है और इस तरह ईश्वर से विमुख है, और उसे एक तारणहार (मुक्त करनेवाला) की आवश्यकता है। दूसरी तरफ इस्लाम, अस्तित्व के मूल में पाप होने और मानव जाति पैदाइशी पापी होने के ईसाई विचार को खारिज करता है। 

मासूम बच्चों के पापग्रस्त होने का विचार ही एक आस्तिक को बिल्कुल बेतुका सा लगता है, जो जानता है कि इस्लाम मनुष्य के निर्माण के मूल में क्षमा होने की बात मानता है पाप के होने की नहीं। इस्लाम के अनुसार मानव जाति शुचिता की अवस्था में जन्म लेती है, वह पाप रहित अवस्था होती है, और स्वाभाविक है कि ईश्वर की पूजा और प्रशंसा में विश्वास करती है। लेकिन साथ ही मनुष्य जाति को स्वतंत्र सोचने की शक्ति भी प्राप्त हुई है और इसलिए वह गलतियाँ भी कर सकती है और पाप भी; यहाँ तक कि वह बड़े दुष्टपूर्ण कार्य भी कर सकती है।   

जब भी कोई व्यक्ति पाप करता है, वह अकेला ही उस पाप का जिम्मेदार होता है। हर व्यक्ति अपने क्रियाकलाप का जिम्मेदार होता है। परिणाम स्वरूप, कोई भी व्यक्ति जो इस संसार में आया है आदम और हव्वा की गलतियों का जिम्मेदार नहीं है। ईश्वर क़ुरआन में कहते हैं: 

“और कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा।” (क़ुरआन 35:18)

आदम और हव्वा ने गलती की, उन्होंने सच्चे दिल से पश्चाताप किया, और ईश्वर ने अपनी अथाह (असीमित) समझ-बूझ के साथ उन्हें क्षमा किया। मानव जाति का भाग्य पीढ़ियों दर पीढ़ी दंडित होने का नहीं है। पिता के दुष्कर्मों का हिसाब पुत्रों को नहीं देना होता।  

“तब उन दोनों ने उस पेड़ का खाया, इसलिए उनके गुप्त अंग उन्हें दिखाई देने लगे, और उन्होंने स्वयं को ढकने के लिये अपने ऊपर स्वर्ग की पत्तियां लगा लीं। इस तरह आदम ने अपने ईश्वर की अवज्ञा की, और गलत राह पर चला गया। तब ईश्वर ने उसे चुना, और उसकी तरफ़ मुड़े और क्षमा किया और मार्गदर्शन किया।” (क़ुरआन 20:121-122)

सबसे प्रथम इस्लाम सिखाता है कि ईश्वर बहुत क्षमाशील है, और बार बार क्षमा करता है। गलतियाँ करना मनुष्य का स्वभाव है। कभी कभी गलतियाँ बिना सोचे समझे या बिना किसी बुरे आशय से की जातीं हैं, लेकिन कभी हम जानबूझ कर भी पाप करते हैं और दूसरों को हानि पहुंचाते हैं। इसलिए मनुष्य होने के नाते हमें सतत क्षमा की आवश्यकता होती है।    

इस संसार में जीवन बहुत परीक्षाओं और समस्याओं से घिरा होता है, लेकिन ईश्वर ने मनुष्य जाति को इन समस्याओं में अकेला नहीं छोड़ा है। ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी है और विकल्प चुनने और निर्णय लेने का विवेक दिया है। ईश्वर ने हमें मार्गदर्शन के उपदेश दिए हैं।  हमारे सर्जक के रूप में, उसे हमारे स्वभाव का पता है और हमें उस सीधे सच्चे मार्ग पर चलने की सीख दी है जो अनंत सुख की ओर ले जाता है।   

क़ुरआन ईश्वर का अंतिम पैगाम है और समूची मानव जाति के लिये लागू है; सब लोगों पर, सब स्थानों पर, सभी समयों पर। पूरी क़ुरआन  में ईश्वर हमें पश्चाताप के लिये उसके पास जाने और क्षमा माँगने के लिये कहते हैं। यही मोक्ष का मार्ग है। यही विनाश से हमारा बचाव है।      

“और जो भी स्वयं पाप करता है या गलती करता है लेकिन बाद में ईश्वर से क्षमा माँगता है, वह अक्सर उस महान दयालु ईश्वर से क्षमा पाएगा” (क़ुरआन 4:110)

“और ओ मेरे लोगों! अपने मालिक से क्षमा मांगों और उससे पश्चाताप करो, वह तुम्हारे लिये (आकाश से) खूब बारिश भेजेगा, तुम्हारी शक्ति को और शक्ति देगा, इसलिए अपराधियों, ईश्वर के एक होने में अविश्वास करने वालों की तरह वापस मत जाओ।” (क़ुरआन 11:52)

“कहो: ‘ओ मेरे सेवकों जिन्होंने अपनी हदें पार की हैं (बुरे काम और पाप करके)! ईश्वर की दया से निराश मत हो, वाकई में ईश्वर सभी पाप माफ़ कर देता है। सच में, वह क्षमाशील है, सबसे दयालु है।” (क़ुरआन 39:53)

क़ुरआन केवल मार्गदर्शन की पुस्तक नहीं है, यह उम्मीद की किताब है। इसमें ईश्वर का प्रेम, दया, और क्षमा बहुत स्पष्ट हैं और इस तरह मनुष्य जाति को स्मरण कराया गया है कि निराश होकर न बैठ जाएँ। किसी व्यक्ति ने कोई भी पाप क्यों न किया हो यदि वह धृढ़तापूर्वक क्षमा माँगने ईश्वर की शरण लेता है, तो उसका मोक्ष पाना निश्चित है। 

पैगंबर मुहम्मद ने पाप को हृदय को ढकने वाले काले धब्बे कहा है। उन्होंने कहा, "वाकई अगर कोई आस्तिक पाप करता है, एक काला धब्बा उसके दिल को ढक लेता है। अगर वह पश्चाताप करता है, पाप करना बंद कर देता है, उसका हृदय फिर साफ़ हो जाता है। और अगर वह पाप करना चालू रखता है (पश्चाताप करने के बजाय) तो वह बढ़ते रहते हैं जब तक कि पूरा हृदय ही ढक नहीं जाता...”[1]

उस मूल पाप के धब्बे के कारण इस्लाम में मोक्ष की आवश्यक्ता नहीं है। मोक्ष की आवश्यकता होती है क्योंकि मनुष्य जाति परिपूर्ण नहीं और उसे ईश्वर की क्षमा और प्रेम की आवश्यकता होती है। मोक्ष के सिद्धांत को सही ढंग से समझने के लिये हमें मोक्ष से जुड़े अन्य विषयों को समझना चाहिए। ये हैं, तौहीद के महत्व को समझने की जरूरत, या ईश्वर एक ही है, और सच्चे दिल से कैसे माफ़ी मांगी जाए।  इन विषयों पर हम अगले दो लेखों में  बात करेंगे।  







फ़ुटनोट:

[1] इब्न-माजाह 

 

 

इस्लाम में मोक्ष (3 का भाग 2): ईश्वर की पूजा और आज्ञा पालन 

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विवरण: इस्लाम में एक ईश्वर में विश्वास ही मोक्ष की राह है। 

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'इस्लाम में मोक्ष' की इस श्रंखला के भाग 1 में, हमने सीखा कि मोक्ष एकमेव ईश्वर की पूजा से मिलता है। हम केवल उस एक की पूजा करते हैं और उसके निर्देशों का पालन करते हैं।  हमने यह भी सीखा कि इस्लाम मानव अस्तित्व के मूल में पाप के होने के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, और इस तरह मुस्लिम मानते हैं कि सब लोग पाप रहित पैदा होते हैं। इस लेख में हम ईसाई धर्म में पश्चाताप की अवधारणा का विश्लेषण करेंगे, जो यीशु का मानव जाति के पापों के कारण मरना है, और हम देखेंगे कि किस तरह इस्लाम इस अवधारणा को पूरी तरह अस्वीकार करता है। इस्लाम में मोक्ष तौहीद, एक ही ईश्वर को मानने से मिलता है।     

तौहीद एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है केवल एक और जब हम तौहीद को ईश्वर के संदर्भ में देखते हैं तो इसका अर्थ है केवल एक ही ईश्वर को मानना और उस पर कायम रहना। यह विश्वास है कि ईश्वर केवल एक है, बिना किसी साथी या भागीदार के। अल्लाह के अतिरिक्त और कोई ईश्वर नहीं जो पूजा के योग्य हो, और यही इस्लाम की बुनियाद है। इस विश्वास के साथ एक और विश्वास कि मुहम्मद उसका पैगंबर है, एक व्यक्ति को मुस्लिम बनाता है। तौहीद में निश्चित रूप से विश्वास करना मोक्ष की गारंटी है।   

“कहो, "वह अल्लाह एक (अनोखा) है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य, और न कोई उसका समकक्ष है।” (क़ुरआन 112)

“निस्संदेह! मैं अल्लाह हूँ! और मेरे अतिरिक्त किसी और को पूजे जाने का अधिकार नहीं है, इसलिए मेरी पूजा करो...” (क़ुरआन 20:14)

“वह आकाशों और धरती का सर्वप्रथम पैदा करनेवाला है। उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है, जबकि उसकी पत्नी ही नहीं? और उसी ने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे हर चीज़ का ज्ञान है। वही अल्लाह तुम्हारा रब (मालिक); उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; हर चीज़ का स्रष्टा है; अतः तुम उसी की बन्दगी करो। वही हर चीज़ का ज़िम्मेदार है। निगाहें उसे नहीं पा सकतीं, बल्कि वही निगाहों को पा लेता है। वह अत्यन्त सूक्ष्म (एवं सूक्ष्मदर्शी) ख़बर रखनेवाला है” (क़ुरआन 6:101-103)

मुस्लिम केवल एक ईश्वर को मानते हैं बिना किसी मध्यस्थों के, उसके कोई भागीदार, साथी, पुत्र, पुत्रियाँ, या सहायक नहीं हैं। उनकी पूजा केवल ईश्वर के लिये है, क्योंकि वही एक पूजा के योग्य है। ईश्वर से बड़ा कोई नहीं।   

ईसाईयों का विश्वास कि यीशु ईश्वर के पुत्र हैं या स्वयं ईश्वर हैं जो तौहीद के बिल्कुल विपरीत है। त्रैलोक्य, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की अवधारणा को इस्लाम नकारता है। यह मानना कि यीशु ने मरकर पश्चाताप किया (या हमारी आत्माओं को बचाया) एक ऐसी अवधारणा है जो इस्लाम की आस्था के पूरी तरह विपरीत है। 

“हे अह्ले किताब (ईसाईयो!) अपने धर्म में अधिकता न करो और ईश्वर पर केवल सत्य ही बोलो। मसीह़ मर्यम का पुत्र केवल ईश्वर का रसूल और उसका शब्द है, जिसे (ईश्वर ने) मर्यम की ओर डाल दिया तथा उसकी ओर से एक आत्मा है, अतः, ईश्वर और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और ये न कहो कि (ईश्वर) तीन हैं, इससे रुक जाओ, यही तुम्हारे लिए अच्छा है, इसके सिवा कुछ नहीं कि ईश्वर ही अकेला पूज्य है, वह इससे पवित्र है कि उसका कोई पुत्र हो, आकाशों तथा धरती में जो कुछ है, उसी का है और ईश्वर काम बनाने के लिए बहुत है।” (क़ुरआन 4:171)

यीशु का सूली पर चढ़कर मरना ईसाई धर्म के केंद्र में है। यह उस धारणा को दर्शाता है कि यीशु ने मानव जाति के पापों के लिये प्राण त्यागे। दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति के पापों का 'प्रतिदान' यीशु ने दे दिया और अब वह जो चाहे करने के लिये स्वतंत्र है, क्योंकि अंत में वह यीशु में विश्वास रखकर मोक्ष प्राप्त कर लेगा। इस्लाम इसे पूरी तरह नकारता है।    

ईश्वर के लिये, यहाँ तक कि उसके पैगंबर के लिये भी यह कतई आवश्यक नहीं कि वह मानव जाति के पापों की क्षमा पाने के लिये अपना बलिदान दे। इस्लाम इस सोच को पूरी तरह खारिज करता है। इस्लाम की बुनियाद इस बात को मजबूती से मानने में है कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की पूजा नहीं करनी चाहिए।  क्षमा उस एक ईश्वर से मिलती है; इसलिए, जब कोई मनुष्य क्षमा माँगता है, उसे ईश्वर के पास समर्पण और सच्चे पश्चाताप की भावना से जाना चाहिए, इस वचन के साथ कि आगे ऐसा नहीं होगा। तभी और केवल तभी सर्वशक्तिमान ईश्वर पापों को क्षमा करेगा।   

इस्लाम सिखाता है कि यीशु मानव जाति के पापों का पश्चाताप करने नहीं आए थे; बल्कि उनका उद्देश्य उनसे पहले आए हुए पैगंबरों के संदेश को दोहराना था। 

“...ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं और ईश्वर ही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है…” (क़ुरआन 3:62)

यीशु के सूली पर चढ़ने और मृत्यु के विषय में इस्लाम का विश्वास बहुत स्पष्ट है। वह मानव जाति के पापों का प्रायश्चित करने के लिये नहीं मरे। यीशु को सूली पर चढ़ाने का षड्यन्त्र था पर वह सफल नहीं हुआ; वह मरे नहीं बल्कि स्वर्ग में चले गए। निर्णय दिवस के आने तक, यीशु फिर इस पृथ्वी पर आएंगे और केवल एक ईश्वर के विश्वास को फैलाना जारी रखेंगे। क़ुरआन बताती है कि निर्णय के दिन यीशु इस बात से इनकार करेंगे कि उन्होंने लोगों से उनको पूजने के लिये कहा था, ईश्वर को या उनके साथ ईश्वर को पूजने के लिये नहीं।        

“और याद करो जब ईश्वर कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे ईसा! क्या तुमने लोगों से कहा था कि ईश्वर के अतिरिक्त दो और पूज्य मुझ और मेरी माँ को बना लो?" वह कहेगा, "महिमावान है तू! मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं यह बात कहूँ, जिसका मुझे कोई हक़ नहीं है। यदि मैंने यह कहा होता तो तुझे मालूम होता। तू जानता है, जो कुछ मेरे मन में है। परन्तु मैं नहीं जानता जो कुछ तेरे मन में है। निश्चय ही, तू छिपी बातों का भली-भाँति जाननेवाला है।  "मैंने उनसे उसके सिवा और कुछ नहीं कहा, जिसका तूने मुझे आदेश दिया था, यह कि ईश्वर की बन्दगी करो, जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है। और जब तक मैं उनमें रहा उनकी ख़बर रखता था, फिर जब तूने मुझे उठा लिया तो फिर तू ही उनका निरीक्षक था और तू ही हर चीज़ का साक्षी है।” (क़ुरआन 5:116-117)

ईश्वर हमें क़ुरआन में बताते हैं कि केवल एक अक्षम्य पाप है, और वह है अगर आप ईश्वर के भागीदारों में विश्वास रखते हुए मर जाते हैं और मृत्यु से पहले उस पर पश्चाताप नहीं करते।    

“निःसंदेह ईश्वर ये नहीं क्षमा करेगा कि उसका साझी बनाया जाये और उसके सिवा जिसे चाहे, क्षमा कर देगा। जो ईश्वर का साझी बनाता है, तो उसने महा पाप गढ़ लिया।” (क़ुरआन 4:48)

अपनी परंपराओं में मुहम्मद ने, ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद उन पर बना रहे, हमें सूचित किया कि ईश्वर ने कहा है, “मैं स्वयं-सिद्ध हूँ, मुझे किसी भागीदार की आवश्यकता नहीं। इसलिए जो भी मेरे साथ किसी और के लिये कोई काम करता है तो मैं उस काम को त्याग दूँगा जो उसने किसी और के लिये किया था।”[1]

लेकिन, ईश्वर को भागीदारों के साथ रखने के इस गंभीर पाप को भी क्षमा किया जा सकता है अगर वह सच्चे मन से ईश्वर के आगे समर्पण करता है, पूरे पश्चाताप के साथ। 

“और निस्संदेह, मैं वाकई में उसके लिये क्षमाशील हूँ जो पश्चाताप करता है, मेरे (केवल एक होने में, और मेरी पूजा में किसी और को साथ न रखने में) विश्वास करता है और न्यायपूर्ण तरह से अच्छे काम करता है, और फिर ऐसा ही करता रहता है (मृत्यु पर्यंत)।” (क़ुरआन 20:82)

“जिन्होंने अविश्वास किया है इनसे कहो, अगर वे ऐसा (अविश्वास करना) बंद कर देते हैं, उनका अतीत क्षमा कर दिया जाएगा।” (क़ुरआन 8:38)

प्रत्येक मनुष्य केवल एक ईश्वर की पूजा करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है। ईश्वर से जुड़े रहकर और अपनी गलतियों और पापों का पश्चाताप मोक्ष का द्वार है। अगले लेख में, हम पश्चाताप की शर्तों पर बात करेंगे।  



फ़ुटनोट:

[1] सहीह मुस्लिम 

 

 

इस्लाम में मोक्ष (3 का भाग 3): पश्चाताप 

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विवरण: पश्चाताप मोक्ष की राह दिखाता है। 

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मोक्ष की राह इस अडिग विश्वास में है कि केवल एक ही ईश्वर है और वह बहुत क्षमाशील है और सबसे अधिक दयावान है। इस्लाम में बिल्कुल स्पष्ट कहा है कि मनुष्य की उत्पत्ति के मूल में पाप जैसी कोई अवधारणा नहीं है और ईश्वर को मानव जाति के पापों और अपराधों को क्षमा करने के लिये किसी के बलिदान की आवश्यकता नहीं है । 

“कहो:"ओ मेरे सेवकों जिन्होंने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया है (बुरे काम और पाप करके)! ईश्वर की दया के प्रति निराश न हो, निस्संदेह, ईश्वर सभी पाप क्षमा कर देता है। सच में, वह बहुत क्षमाशील और सबसे दयालु है।” (क़ुरआन 39:53)                           

गलतियाँ करना, ईश्वर के प्रति हमारी आज्ञाकारिता में गिरावट आना, उसे भूल जाना, और पापलिप्त हो जाना मानव जाति के त्रुटिपूर्ण स्वभाव का अंग है। कोई मनुष्य पाप से मुक्त नहीं है, चाहे हम कितना ही अच्छा दिखाई दें और हर मनुष्य को ईश्वर की क्षमा की जरूरत होती है। पैगंबर मुहम्मद, ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद उन पर बने रहें, इस बात को अच्छी तरह जानते थे जब उन्होंने अपने साथियों से यह कहा। 

“जिनके हाथों में मेरी आत्मा है, अगर तुमने पाप नहीं किया ईश्वर तुम्हें हटा कर और ऐसे लोगों को लाएंगे जो पाप करेंगे और फिर क्षमा के लिये प्रार्थना करेंगे।”[1]

“आदम का हर बेटा पाप करता है और पाप करने वालों में सबसे अच्छे वे हैं जो पश्चाताप करते हैं।”[2]

हम सभी कमज़ोर हैं, हम सभी पाप करते हैं, और हम सभी को क्षमा की आवश्यकता है। हमारे अंदर ईश्वर से निकटता अनुभव करने की नैसर्गिक आवश्यकता होती है और ईश्वर ने अपनी अपार बुद्धिमत्ता से क्षमा का मार्ग काफ़ी सुगम बना दिया है। पैगंबर मुहम्मद को भी स्वयं विशेष आनंद का अनुभव हुआ, जो उन्हें अपने मालिक के साथ 'सही' होने के अनुभव से मिला। उन्होंने कहा, “ईश्वर की शपथ, मैं ईश्वर से क्षमा चाहता हूँ और मैं दिन भर में सत्तर बार से अधिक ईश्वर से पश्चाताप प्रकट करता हूँ।”[3]

ईश्वर, हमारा सर्जक, मनुष्य जाति को भली भांति जानता है, वह हमारी अपूर्णता को और कमजोरियों को जानता है, और इसलिए उसने हमारे लिये पश्चाताप का मार्ग बताया है और पश्चाताप का द्वार खुला रखा है जब तक कि सूर्य पश्चिम से ही न उगने लगे (निर्णय दिवस के आसपास)। 

“और अपने मालिक की शरण में पश्चाताप और आज्ञाकारिता की पूरी आस्था के साथ जाओ, इसके पहले कि तुम्हारे ऊपर कष्ट आए, तब तुम्हारी सहायता नहीं की जाएगी।” (क़ुरआन 39:54)

“ओ आस्था रखने वाले! ईश्वर के पास सच्चे पश्चाताप के साथ जाओ! हो सकता है ईश्वर तुम्हें तुम्हारे पापों से मुक्त कर दें, और तुम्हें उद्यान में प्रवेश करने दें जिसके नीचे नदियाँ बहती है (स्वर्ग)…”(क़ुरआन 66:8)

“और तुम सभी ईश्वर से प्रार्थना करो कि तुम्हें क्षमा कर दें, ओ आस्तिकों, तुम सफल हो सकते हो।” (क़ुरआन 24:31)

पश्चाताप इतना ही आसान है जितना ईश्वर के पास जाना और उससे दया और क्षमा मांगना। सबसे घने अँधेरों में या सबसे लंबी रातों में, ईश्वर इसके लिये तुम्हारी प्रतीक्षा करता है कि तुम उसके पास जाओ और उससे पश्चाताप प्रकट करो। 

“ईश्वर रात को अपना हाथ आगे बढ़ाता है उन लोगों का पश्चाताप स्वीकार करने के लिये जिन्होंने दिन में पाप किया, और दिन में अपना हाथ आगे बढ़ाता है उन लोगों का पश्चाताप स्वीकार करने के लिये जिन्होंने रात में पाप किया, (और यह क्रम जारी रहेगा) जब तक कि सूर्य पश्चिम से उदय न हो जाए।”[4]

कोई अपराध इतना छोटा या इतना बड़ा पाप नहीं होता कि कोई ईश्वर को पुकारे और  वह उसके प्रति दयालु न हो। पैगंबर मुहम्मद ने, ईश्वर की दया और आशीर्वाद उन पर बना रहे, एक ऐसे आदमी की कहानी सुनाई जिसके पाप इतने बड़े थे कि दया की कोई आशा नहीं थी, लेकिन ईश्वर बहुत दयालु और क्षमाशील है। यहाँ तक कि वे भी, जिनका जीवन इतना टूट चुका हो और पाप से इतना कलुषित हो गया हो कि जिसे संवारा न जा सकता हो, सुकून पाते हैं। । 

“तुमसे पहले यहाँ एक आदमी आया जिसने निन्यानवे लोगों की हत्या की थी। तब उसने पूछा कि पृथ्वी पर सबसे बुद्दिमान व्यक्ति कौन है, उसे एक साधु के पास भेजा गया, तो वह उसके पास गया, उसे बताया कि उसने निन्यानवे लोगों की हत्या की है, और पूछा क्या उसे क्षमा मिल सकती है। साधु ने कहा, 'नहीं', तो उसने साधु को मार दिया और इस तरह सौ पूरे कर लिये। तब उसने पूछा कि पृथ्वी पर सबसे बुद्दिमान व्यक्ति कौन है और उसे एक विद्वान के पास भेजा गया। उसने विद्वान को बताया कि उसने सौ लोगों की हत्या की है, और पूछा क्या उसे क्षमा मिल सकती है।  विद्वान ने कहा, "हाँ, तुम्हारे और पश्चाताप के बीच में भला क्या आ सकता है? तुम फलां शहर में जाओ, क्योंकि वहाँ ऐसे लोग हैं जो ईश्वर की पूजा करते हैं। जाओ और उनके साथ पूजा करो, और अपने शहर में वापस मत जाना क्योंकि वह बुरी जगह है।” तो वह आदमी चल दिया, पर जब वह आधे रास्ते में था, मृत्यु का देवदूत उसके पास आया, तो दया का देवदूत और क्रोध का देवदूत उसके बारे में बहस करने लगे। दया का देवदूत बोला: 'वह पश्चाताप कर रहा था और ईश्वर को खोज रहा था।' क्रोध के देवदूत ने कहा: ‘उसने कभी कोई अच्छा काम नहीं किया।’ एक देवदूत मनुष्य का रूप धर कर उनके पास आया, और उन्होंने उससे मामले का फैसला करने को कहा। उसने कहा, ‘दोनों शहरों के बीच की दूरी नापो  (उसके घर का शहर और जिस शहर को वह जा रहा था), और जिस शहर के वह ज़्यादा निकट है वह वहीं का निवासी है।’ तो उन्होंने दूरी नापी, और पाया कि जिस शहर को वह जा रहा था वह उसके अधिक निकट था, इसलिए दया का देवदूत उसे ले गया।”[5]

पैगंबर मुहम्मद की, ईश्वर की दया और आशीर्वाद उन पर बना रहे, पारंपरिक कथाओं में इसके दूसरे  संस्करण के अनुसार, वह व्यक्ति अच्छे शहर से हाथ भर की दूरी से अधिक निकट था, इसलिए उसे उस शहर के लोगों में गिन लिया गया।[6]

शांतिपूर्ण जीवन बिताने के लिये पश्चाताप बहुत जरूरी है। पश्चाताप का पुरुस्कार है ईश्वर के निकट एक अच्छा जीवन जिसमें संतोष है और मन की शांति है। लेकिन, पश्चाताप की तीन शर्तें हैं। वे हैं, पाप से दूर होना, पाप करने पर जीवन भर दुख की भावना रखना, और प्रण करना कि फिर कभी पाप नहीं करना। अगर ये तीन शर्तें सच्चे मन से पूरी की जाएँ तो ईश्वर क्षमा कर देंगे। अगर पाप से किसी दूसरे के अधिकारों का हनन होता हो, तो एक चौथी शर्त है। जहाँ तक मानव क्षमता हो, हनन किए अधिकारों को बहाल करना। 

ईश्वर की दया और क्षमाशीलता इतनी व्यापक है कि वह क्षमा करता रहेगा। अगर व्यक्ति सच्चा है, ईश्वर उसे क्षमा कर देंगे जब तक कि मृत्यु की खड़खड़ाहट गले तक न पहुँच जाए। 

जाने माने इस्लामिक विद्वान इब्न कथीर ने कहा है, “निश्चय ही, जब जीते रहने की आशा धुंधली होने लगे, मृत्यु का देवदूत आत्मा को लेने आ जाता है। आत्मा जब गले तक पहुँचती है, और उसे धीरे से निकाला जाता है, तो उस समय पश्चाताप की स्वीकृति नहीं होती।”[7]

सच्चे पश्चाताप में ही मोक्ष पाने की राह है। मोक्ष ईश्वर की सच्ची भक्ति से प्राप्त होता है। उसके अतिरिक्त और कोई ईश्वर नहीं हैं, वही सबसे शक्तिशाली है, सबसे दयालु है, सबसे अधिक क्षमाशील है।[8]




फ़ुटनोट:

[1] सहीह मुस्लिम 

[2] अल -तिरमिधि 

[3] सहीह अल-बुखारी 

[4] सहीह मुस्लिम 

[5] सहीह अल-बुखारीसहीह मुस्लिम

[6] सहीह मुस्लिम 

[7] तफ़सीर इब्न कथीर, अध्याय 4, आयत 18.

[8] ईश्वर की क्षमाशीलता के बारे में अधिक जानकारी के लिये कृपया इस शीर्षक के लेख देखें  Accepting Islam parts 1 & 2. (https://www.islamreligion.com/articles/3727/viewall/)

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