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पैगंबर मुहम्मद के महान जीवन में पैगंबरी के संकेत (भाग 2 का भाग 1): पैगंबर मुहम्मद का प्रारंभिक जीवन

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विवरण: पैगंबर मुहम्मद का जीवन ईश्वर द्वारा निर्देशित था और यह बहुत कम उम्र से ही प्रदर्शित किया गया था।

  • द्वारा Aisha Stacey (© 2013 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 1
  • देखा गया: 932 (दैनिक औसत: 5)
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"पैगंबर मुहम्मद आप में से किसी के पिता नहीं हैं, लेकिन वह ईश्वर के दूत और वह आखरी नबी हैं और ईश्वर को सभी बातों का ज्ञान है।” (क़ुरआन 33:40)

SignsProphethood1.jpgजब कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है, तो वह पैगंबर मुहम्मद को ईश्वर का अंतिम पैगंबर के रूप में भी स्वीकार करता है और वह इस बात की भी पुष्टि करता है कि पांच दैनिक प्रार्थनाओं में से कोई भी प्रार्थना अदा करेगा। इसके अलावा दुनिया में लगभग 1.5 अरब से भी अधिक लोग मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद का जीवन अनुकरणीय और आकांक्षा के योग्य है। हालाँकि बहुत से लोग पैगंबर मुहम्मद को जाने बिना ही इस्लाम को अपना लेते हैं, ईश्वर उनलोगों पर अपनी रहमत बनाए रखे। शायद वे सभी जानते हैं कि वह अरब प्रायद्वीप में पैदा हुए थे और वहीं पल बड़े और उन्होंने क़ुरआन के रूप में ईश्वर का शाब्दिक वचन प्राप्त किया था। निम्नलिखित दो लेखों में हम पैगंबर मुहम्मद के महान जीवन के बारे में जानेंगे। ये हमारी जानकारी को तो बढ़ाएगा ही और दिलसे प्यार करना भी सिखाएंगे। हम उसके नेक जीवन में भविष्यवक्ता को देखकर इससे सही ज्ञान प्राप्त करेंगे।

अरबी में पैगंबर (नबी) शब्द नबअ शब्द से बना है जिसका अर्थ समाचार होता है। इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि एक पैगंबर ईश्वर और उसके संदेश को आम लोगों तक पहुंचता है। वे एक अर्थ में पृथ्वी पर ईश्वर के राजदूत हैं। उनका मिशन एक ईश्वर के पूजा करने का संदेश देना है। इसमें लोगों को पूजा के लिए बुलाना, संदेश की व्याख्या करना, खुशखबरी या चेतावनी देना और राष्ट्र के मामलों का निर्देशन करना शामिल है। सभी नबी ईमानदारी और पूरी तरह से ईश्वर के संदेश को व्यक्त करने के लिए उत्सुक थे और इसमें हमारे अंतिम पैगंबर मुहम्मद भी शामिल थे। अपने अंतिम उपदेश के दौरान पैगंबर मुहम्मद ने तीन बार सभा से पूछा कि क्या ‘ मैं ने ईश्वर का पूरा पैगाम आप तक पहुंचाया है कि नहीं ' आसमान कि और इशारह करते हुए ईश्वर से सहाबा किराम (माननीय साथियों)  के जवाब को अपने इश्वर को सुनने के लिए कहा, जो जवाब एक शानदार "हाँ!" था।

साथ ही साथ एक ईश्वर को उनके आह्वान का सार, पैगंबरों की सच्चाई का एक और स्वीकृत संकेत यह है कि वे अपना जीवन कैसे जीते हैं। पैगंबर मुहम्मद के जीवन के वृत्तांत जो हमें अपने धर्मी पूर्ववर्तियों से विरासत में मिले हैं, यह दर्शाते हैं कि हमारे नबी की भविष्यवाणी शुरू से ही ईश्वर के द्वारा निर्देशित थी। बहुत पहले से ही पैगंबर मुहम्मद को मानव जाति को सही रास्ते पर ले जाने के लिए तैयार किया जा रहा था और उनके जीवन के अनुभवों ने उन्हें इस तरह के एक बड़ी जिम्मेदारी के लिए अच्छी स्थिति में खड़ा कर दिया। फिर 40 वर्ष की आयु में जब उन्हें नबूअत प्रदान किया गया, तब भी ईश्वर ने उनके लक्ष्य का समर्थन और पुष्टि करना जारी रखा। पैगंबर मुहम्मद के जीवन का लेखा-जोखा उनके अनुकरणीय चरित्र के उदाहरणों से भरा पड़ा है; जैसे वह दयालु, सच्चा, बहादुर, और उदार थे। वह आख़िरत की तैयारी कर रहे थे।  पैगंबर मुहम्मद जिस तरह से अपने साथियों, परिचितों, दुश्मनों, जानवरों और यहां तक ​​​​कि निर्जीव वस्तुओं के साथ व्यवहार करते थे, उसमें कोई संदेह नहीं था कि वह हमेशा ईश्वर के प्रति जागरूक थे।

पैगंबर मुहम्मद का जन्म कई तथाकथित चमत्कारी घटनाओं के साथ हुआ था और असाधारण घटनाओं की बात निस्संदेह पैगंबर के संकेत के रूप में कार्य करती थी, हालांकि हमें उन असाधारण घटनाओं में अनारक्षित रूप से विश्वास करने के बारे में सतर्क रहना चाहिए। इस्लामी इतिहास के सभी जानकारों और इतिहासकारों द्वारा सभी घटनाओं को स्वीकार नहीं किया जाता है, हालांकि वे एक असाधारण शुरुआत और अल्लाह द्वारा निर्देशित जीवन का संकेत देते हैं, वे अलंकृत या अतिरंजित हो सकते हैं।

पैगंबर मुहम्मद के बचपन को विशेष और साधारण परिस्थितियों ने घेर लिया और निस्संदेह उनके चरित्र पर असर पड़ा। जब वह आठ साल के थे, तब उन्होंने अपने दोनों माता-पिता और अपने प्यारे दादा अब्दुल मुत्तलिब को खो दिया था। उनकी परवरिश उनके चाचा और उनके महान समर्थक अबू तालिब की देखभाल से हुई। इस प्रकार एक छोटे लड़के के रूप में भी वह पहले से ही बड़ी भावनात्मक और शारीरिक उथल-पुथल का सामना कर चुके थे। मुहम्मद के जीवन को कई इतिहासकार और क़ुरआन दोनों ही उनके बाधित जीवन को स्वीकार करते हैं।

क्या उसने तुम्हें (हे मुहम्मद) अनाथ नहीं पाया और तुम्हें शरण दी? (क़ुरआन 93:6)

मुहम्मद के चाचा अबू तालिब गरीब थे और अपने परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष करते थे, इसलिए अपनी किशोरावस्था के दौरान पैगंबर मुहम्मद ने एक चरवाहे के रूप में काम किया। इस व्यवसाय से उन्होंने एकांत को अपनाना सीखा और धैर्य, सतर्कता, देखभाल, नेतृत्व और खतरे को महसूस करने की क्षमता जैसे गुणों को विकसित किया। चरवाहा एक ऐसा पेशा था जिसके बारे में हम जानते हैं कि ईश्वर के सभी नबियों में एक समान बात था। ’… उनके साथियों ने पूछा, “क्या आप एक चरवाहा थे?” उन्होंने उत्तर दिया, "ऐसा कोई नबी नहीं था जो चरवाहा न हो।"’[1]

अपनी किशोरावस्था में मुहम्मद कभी-कभी अबू तालिब के साथ, कारवां के साथ व्यापार केंद्रों की यात्रा करते थे। कहा जाता है कि कम से कम एक अवसर पर उन्होंने सीरिया के तरह उत्तर की ओर यात्रा की थी।  पुराने व्यापारियों ने उनके चरित्र को पहचाना और उनका उपनाम अल-अमीन रखा, जिसका अर्थ होता है "जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं"। उनकी युवावस्था में भी उन्हें सच्चे और भरोसेमंद के रूप में जाना जाता था।  एक कहानी जिसे अधिकांश इस्लामी विद्वानों और इतिहासकारों ने स्वीकार किया है। वह पैगंबर मुहम्मद की सीरिया की यात्राओं में से एक है।

कहानी यह है कि भिक्षु (सन्यासी बाबा) बहिरा ने आने वाले नबी की भविष्यवाणी की और अबू तालिब को "अपने भतीजे की सावधानी से रक्षा करने" की सलाह दी।  जीवनी लेखक इब्न इशाक के अनुसार, जिस कारवां में पैगंबर मुहम्मद यात्रा कर रहे थे, शहर के किनारे पर पहुंचे, बहिरा को एक बादल दिखाई दे रहा था जो छावं करते हुए एक जवान आदमी का पीछा कर रहा था। जब कारवां कुछ पेड़ों की छाया के नीचे रुका, तो बहिरा ने "बादल को देखा, तब वह पेड़ पर छाया हुआ था, और उसकी शाखाएँ ईश्वर का हुकम से झुकी हुई थीं, जब तक कि वह उसके नीचे छाया में रहे।" बहिरा ने यह देखने के बाद मुहम्मद को करीब से देखा और उनसे कई ईसाई भविष्यवाणियों के बारे में कई सवाल पूछे, जिनके बारे में उन्होंने पढ़ा और सुना था।

युवा मुहम्मद अपने लोगों के बीच अपने शालीनता, सदाचारी व्यवहार और शालीन व्यवहार के लिए प्रतिष्ठित थे, इस प्रकार उनके साथियों के लिए उन्हें देखना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। यहां तक ​​​​कि एक युवा के रूप में भी कई साल पहले अंधविश्वासी प्रथाओं को छोड़ दिया तथा शराब पीने, पत्थर की वेदियों पर वध किए गए मांस खाने या मूर्तिपूजा उत्सवों में भाग लेने से दूर रहें। जब तक वह वयस्क होते, तब तक मुहम्मद को मक्का समुदाय का सबसे विश्वसनीय और भरोसेमंद सदस्य माना जाता था। यहां तक ​​कि जो लोग छोटे आदिवासी झगड़ों से खुद को चिंतित रखते थे, वे भी मुहम्मद की ईमानदारी और अखंडता को स्वीकार करते थे।

मुहम्मद के गुण और अच्छे नैतिक चरित्र कम उम्र से ही स्थापित हो गए थे, और ईश्वर ने उनका समर्थन और मार्गदर्शन करना जारी रखा। जब वह 40 वर्ष के थे, तब मुहम्मद को दुनिया को बदलने तथा पूरी मानवता को लाभ पहुंचाने का साधन दिया गया था।

निम्नलिखित लेख में हम देखेंगे कि पैगंबर बनने के बाद मुहम्मद का जीवन कैसे बदल गया और निष्कर्ष निकाला कि उन लोगों को विश्वास देना अनुचित है जो दावा करते हैं कि मुहम्मद झूठे पैगंबर थे। उन्होंने आराम, धन, महानता, महिमा या शक्ति प्राप्त करने के लिए पैगंबरी नहीं किया।

 



फुटनोट:

[1] सहीह अल-बुखारी

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