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पवित्र क़ुरआन में यीशु और मरियम की कहानी (3 का भाग 1): मरियम

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विवरण: निम्नलिखित तीन भागो की श्रृंखला में मरयम (यीशु की माता) के बारे में पवित्र क़ुरआन के छंद शामिल हैं, जिसमें उनके जन्म, बचपन, व्यक्तिगत गुण और यीशु का चमत्कारी जन्म शामिल है।

  • द्वारा IslamReligion.com
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 19 Sep 2022
  • मुद्रित: 2
  • देखा गया: 1584 (दैनिक औसत: 5)
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मरियम का जन्म

“वस्तुतः, ईश्वर ने आदम, नूह़, इब्राहीम की संतान तथा इमरान की संतान को संसार वासियों में चुन लिया था। ये एक-दूसरे की संतान हैं और अल्लाह सब सुनता और जानता है। जब इमरान की पत्नी ने कहाः हे मेरे पालनहार! जो मेरे गर्भ में है, मैंने तेरे लिए उसे मुक्त करने की मनौती मान ली है। तू इसे मुझसे स्वीकार कर ले। वास्तव में, तू ही सब कुछ सुनता और जानता है। फिर जब उसने बालिका जनी, तो (संताप से) कहाः मेरे पालनहार! मुझे तो बालिका हो गयी, हालाँकि जो उसने जना, उसका अल्लाह को भली-भाँति ज्ञान था -और नर नारी के समान नहीं होता- और मैंने उसका नाम मर्यम रखा है और मैं उसे तथा उसकी संतान को धिक्कारे हुए शैतान से तेरी शरण में देती हूँ।'' (क़ुरआन 3:33-36)

मरियम का बचपन

"तो तेरे पालनहार ने उसे भली-भाँति स्वीकार कर लिया तथा उसका अच्छा प्रतिपालन किया और ज़करिय्या को उसका संरक्षक बनाया। ज़करिय्या जबभी उसके मेह़राब (उपासना कक्ष) में जाता, तो उसके पास कुछ खाद्य पदार्थ पाता, वह कहता कि हे मरयम! ये कहाँ से (आया) है? वह कहतीः ये ईश्वर के पास से आया है। वास्तव में, ईश्वर जिसे चाहता है, अगणित जीविका प्रदा करता है।" (क़ुरआन 3:37)

भक्त मरियम

"और (याद करो) जब स्वर्गदूतो ने मरयम से कहाः हे मरयम! तुझे ईश्वर ने चुन लिया तथा पवित्रता प्रदान की और संसार की स्त्रियों पर तुझे चुन लिया। हे मरयम! अपने पालनहार की आज्ञाकारी रहो, सज्दा करो तथा रुकूअ करने वालों के साथ रुकूअ करती रहो। ये ग़ैब (परोक्ष) की सूचनायें हैं, जिन्हें हम आपकी ओर प्रकाशना कर रहे हैं और आप उनके पास उपस्थित नहीं थे, जब वे अपनी पर्चियां फेंक रहे थे कि कौन मरयम का अभिरक्षण करेगा और न उनके पास उपस्थित थे, जब वे झगड़ रहे थे।” (क़ुरआन  3:42-44)

नवजात बच्चे के लिए खुशखबरी

"जब स्वर्दूतो ने कहाः हे मरयम! ईश्वर तुझे अपने एक शब्द की शुभ सूचना दे रहा है, जिसका नाम मसीह़ ईसा पुत्र मरयम होगा। वह लोक-प्रलोक में प्रमुख तथा मेरे समीपवर्तियों में होगा। वह लोगों से गोद में तथा अधेड़ आयु में बातें करेगा और सदाचारियों में होगा। मरयम ने (आश्चर्य से) कहाः मेरे पालनहार! मुझे पुत्र कहाँ से होगा, मुझे तो किसी पुरुष ने हाथ भी नहीं लगाया है? उसने कहाः इसी प्रकार ईश्वर जो चाहता है, उत्पन्न कर देता है। जब वह किसी काम के करने का निर्णय कर लेता है, तो उसके लिए कहता है किः "हो जा", तो वह हो जाता है। और ईश्वर उसे पुस्तक तथा प्रबोध और तौरात तथा इंजील की शिक्षा देगा। और फिर वह बनी इस्राईल का एक दूत होगा और कहेगाः कि मैं तुम्हारे पालनहार की ओर से निशानी लाया हूं। मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से पक्षी के आकार के समान बनाऊंगा, फिर उसमें फूंक दूंगा, तो वह ईश्वर की अनुमति से पक्षी बन जायेगा और ईश्वर की अनुमति से जन्म से अंधे तथा कोढ़ी को स्वस्थ कर दूंगा और मुर्दो को जीवित कर दूंगा तथा जो कुछ तुम खाते तथा अपने घरों में संचित करते हो, उसे तुम्हें बता दूंगा। निःसंदेह, इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानियां हैं, यदि तुम विश्वासी हो। तथा मैं उसकी सिध्दि करने वाला हूं, जो मुझसे पहले की है 'तौरात'। तुम्हारे लिए कुछ चीज़ों को ह़लाला (वैध) करने वाला हूं, जो तुमपर ह़राम (अवैध) की गयी है तथा मैं तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की निशानी लेकर आया हूं। अतः तुम ईश्वर से डरो और मेरे आज्ञाकारी हो जाओ। वास्तव में, ईश्वर मेरा और तुम सबका पालनहार है। अतः उसी की वंदना करो। यही सीधी डगर है।" (क़ुरआन 3:45-51)

"तथा आप, इस पुस्तक (क़ुरआन) मे मरयम की चर्चा करें, जब वह अपने परिजनों से अलग होकर एक पूर्वी स्थान की ओर आयीं। फिर उनकी ओर से पर्दा कर लिया, तो हमने उसकी ओर अपनी रूह़ (आत्मा) को भेजा, तो उसने उसके लिए एक पूरे मनुष्य का रूप धारण कर लिया। उसने कहाः मैं शरण माँगती हूँ अत्यंत कृपाशील की तुझ से, यदि तुझे ईश्वर का कुछ भी भय हो।"[1] स्वर्गदूत ने कहाः मैं तेरे पालनहार का भेजा हुआ हूँ, ताकि तुझे एक पुनीत बालक प्रदान कर दूँ। वह बोलीः ये कैसे हो सकता है कि मेरे बालक हों, जबकि किसी पुरुष ने मुझे स्पर्श भी नहीं किया है और न मैं व्यभिचारिणी हूँ? स्वर्गदूत ने कहाः ऐसा ही होगा, तेरे पालनहार का वचन है कि वह मेरे लिए अति सरल है और ताकि हम उसे लोगों के लिए एक निशानी बनायें तथा अपनी विशेष दया से और ये एक निश्चित बात है।[2] (क़ुरआन 19:16-21)

बेदाग गर्भाधान

"तथा जिसने रक्षा की अपनी सतीत्व की, तो फूंक दी हमने उसके भीतर अपनी आत्मा से और उसे तथा उसके पुत्र को बना दिया एक निशानी संसार वासियों के लिए।"[3] (क़ुरआन  21:91)

यीशु का जन्म

"फिर वह गर्भवती हो गई तथा उस (गर्भ को लेकर) दूर स्थान पर चली गयी। फिर प्रसव पीड़ा उसे एक खजूर के तने तक लायी, कहने लगीः क्या ही अच्छा होता, मैं इससे पहले ही मर जाती और भूली-बिसरी हो जाती। तो उसके नीचे से पुकारा कि उदासीन न हो, तेरे पालनहार ने तेरे नीचे एक स्रोत बहा दिया है। और हिला दे अपनी ओर खजूर के तने को, तुझपर गिरायेगा वह ताज़ी पकी खजूरें। अतः, खा, पी तथा आँख ठण्डी कर। फिर यदि किसी पुरुष को देखे, तो कह देः वास्तव में, मैंने मनौती मान रखी है, अत्यंत कृपाशील के लिए व्रत की। अतः, मैं आज किसी मनुष्य से बात नहीं करूँगी। फिर उस (शिशु ईसा) को लेकर अपनी जाति में आयी, सबने कहाः हे मरयम! तूने बहुत बुरा किया। हे हारून की बहन! तेरा पिता कोई बुरा व्यक्ति न था और न तेरी माँ व्यभिचारिणी थी। मरयम ने उस (शिशु) की ओर संकेत किया। लोगों ने कहाः हम कैसे उससे बात करें, जो गोद में पड़ा हुआ एक शिशु है? वह (शिशु) बोल पड़ाः मैं ईश्वर का भक्त हूँ। उसने मुझे पुस्तक (इन्जील) प्रदान की है तथा मुझे पैगंबर बनाया है। [4]  तथा मुझे शुभ बनाया है, जहां रहूं और मुझे आदेश दिया है प्रार्थना तथा दान का, जब तक जीवित रहूं। तथा आपनी माँ का सेवक (बनाया है) और उसने मुझे क्रूर तथा अभागा नहीं बनाया है। तथा शान्ति है मुझपर, जिस दिन मैंने जन्म लिया, जिस दिन मरूंगा और जिस दिन पुनः जीवित किया जाऊंगा।” (क़ुरआन 19:22-33)

“वस्तुतः ईश्वर के पास ईसा की मिसाल ऐसी ही है, जैसे आदम की। उसे (अर्थात, आदम को) मिट्टी से उत्पन्न किया, फिर उससे कहाः "हो जा" तो वह हो गया।[5] (क़ुरआन 3:59)

"और हमने बना दिया मरयम के पुत्र तथा उसकी माँ को एक निशानी तथा दोनों को शरण दी एक उच्च बसने योग्य तथा प्रवाहित स्रोत के स्थान की ओर।"[6] (क़ुरआन 23:50)

मरियम की उत्कृष्टता

"तथा उदाहरण दिया है ईश्वर ने उनके लिए, जो विश्वासी थे, फ़िरऔन की पत्नी का। जब उसने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! बना दे मेरे लिए अपने पास एक घर स्वर्ग में तथा मुझे मुक्त कर दे फ़िरऔन तथा उसके कर्म से और मुझे मुक्त कर दे अत्याचारी जाति से। तथा मरयम, इमरान की पुत्री का, जिसने रक्षा की अपने सतीत्व की, तो फूँक दी हमने उसमें अपनी ओर से रूह़ (आत्मा) तथा उस (मरयम) ने सच माना अपने पालनहार की बातों और उसकी पुस्तकों को और वह भक्तो में से थी।” (क़ुरआन 66:11-12)



फुटनोट:

[1] सबसे दयालु, क़ुरआन में ईश्वर के नामों में से एक है।

[2] यीशु ईश्वर की शक्ति का प्रतीक है, जहाँ ईश्वर ने लोगों को दिखाया कि वह बिना पिता के यीशु को बना सकता है, जैसे उसने आदम को बिना माता-पिता के बनाया। यीशु भी एक संकेत है कि ईश्वर सभी लोगों को उनकी मृत्यु के बाद पुनर्जीवित करने में सक्षम है, क्योंकि जो बिना किसी चीज़ से बनाता है वह जीवन में वापस लाने मे भी सक्षम है। वह न्याय के दिन का भी चिन्ह है, जब वह पृथ्वी पर लौटेंगे और अंत समय में मसीह विरोधी को मार डालेंगे।

[3] ठीक उसी तरह जैसे ईश्वर ने आदम को बिना पिता या माता के बनाया, यीशु का जन्म बिना पिता की माता से हुआ था। ईश्वर को कुछ भी करने के लिए बस कहना है, "हो जा" और वह हो जाता है; क्योंकि ईश्वर सब कुछ करने में समर्थ है।

[4] पैगंबर सर्वोच्च और सबसे सम्मानजनक पद है जिस तक मनुष्य पहुँच सकता है। एक पैगंबर वह होता है जो स्वर्गदूत जिब्रईल के माध्यम से ईश्वर से रहस्योद्घाटन प्राप्त करता है।

[5] आदम को तब बनाया गया जब ईश्वर ने कहा, "हो जा," और वह बिना पिता या माता के हुए। और ऐसा ही यीशु को ईश्वर के वचन के द्वारा बनाया गया था। यदि यीशु का असामान्य जन्म उसे दिव्य बनाता है, तो आदम उस देवत्व के अधिक योग्य है क्योंकि यीशु के कम से कम एक माता थी, जबकि आदम के पास पिता या माता कोई नहीं था। जैसे आदम दैवीय नहीं है, वैसे ही यीशु भी दैवीय नहीं है, लेकिन दोनों ही ईश्वर के विनम्र सेवक हैं।

[6] यहीं पर मरियम ने यीशु को जन्म दिया।

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