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मैं मुसलमान होना चाहता हूं लेकिन... इस्लाम क़बूल करने के बारे में मिथक (भाग 3 का 1)

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विवरण: ईश्वर इस्लाम क़बूल करना आसान बनाता है, मुश्किल नहीं।

  • द्वारा Aisha Stacey (© 2011 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 14 Aug 2022
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 1802 (दैनिक औसत: 4)
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IwantToBeMuslimPart1.jpgइस्लाम में सबसे बुनियादी मान्यता यह है कि ईश्वर के अलावा कोई सच्चा ईश्वर (देवता) नहीं है। वह एकमात्र, पहला और आखिरी, उसका कोई साथी, पुत्र, पुत्री या बिचौलिया नहीं है। वह अपने प्रभुत्व और अपने सर्व-शक्तिमान के क्षेत्र में अकेला है। यह एक बहुत ही सरल अवधारणा है, यह सिर्फ एक सच्चाई है। फिर भी कभी-कभी ईश्वर पर सच्ची आस्था भारी पड़ सकती है। हमें अक्सर हैरानी होती है जब हम ईश्वर को पुकारते हैं और वह तुरंत जवाब देता है।

इस्लाम धर्म उस सरल अवधारणा को सम्मिलित करता है – कि ईश्वर एक है और इसे आत्मसमर्पण नामक पैकेज में प्रदान किया गया है। इस्लाम का मतलब है, ईश्वर की इच्छा के आगे आत्मसमर्पण करना। इस्लाम (सा-ला-मा) का मूल शब्द वही है जो अरबी शब्द के साथ साझा किया गया है जिसका मतलब है अमन और शांति। संक्षेप में, अमन और शांति ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीने से आती है। जीवन के एक चक्र की तरह, यह हमेशा एक ही जगह पर शुरू और समाप्त होता है – ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है। जब हम ईश्वर की इच्छा के आगे आत्मसमर्पण करते  हैं, तो हम मुसलमान कहलाते हैं और अपनी ईमानदारी का प्रदर्शन करने के लिए हम अकेले या अन्य मुसलमानों के साथ, ला इलाह इल्ला अल्लाह, मुहम्मद रसूल अल्लाह कहकर मुसलमान होने की गवाही देते हैं। ईश्वर के अलावा कोई सच्चा ईश्वर (देवता) नहीं है, और मुहम्मद, ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे, उनके पैगंबर हैं।

जब भी कोई व्यक्ति ईश्वर की दया का अनुभव करता है और उसे समझता है, शैतान उस व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की पूरी कोशिश करता है। शैतान नहीं चाहता कि हम सांत्वना और दया महसूस करें; वह चाहता है कि हम चिंतित और उदास रहें। वह चाहता है कि हम गलतियां और पाप करें। शैतान हमेशा ईश्वर के प्रेम को महसूस करने से मायूस हो जाता है इसलिए वह अधिक से अधिक मनुष्यों को भ्रष्ट करना चाहता है।

(शैतान ने कहा)  “…मैं भी लोगों के लिए तेरे सीधे मार्ग पर बैठूंगा। फिर उन पर आऊँगा उनके सामने से और उनके पीछे से और उनके दायें से और उनके बायें से…” (क़ुरआन 7:16-17) 

जब भी कोई व्यक्ति सच्चाई का एहसास करता है और मुसलमान होना चाहता है, तो शैतान 'लेकिन' शब्द लेकर आता है। मुझे मुसलमान बनना है...लेकिन! लेकिन मैं तैयार नहीं हूं। लेकिन मैं अरबी भाषा नहीं बोलता। लेकिन मैं श्वेत हूं। लेकिन मैं असल में इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानता। ईश्वर ने हमें शैतान और उसके शातिर तरीकों से सावधान किया।

“ऐ आदम की संतान, शैतान तुमको भ्रमित न कर दे।” (क़ुरआन 7:27)

“निसंदेह शैतान तुम्हारा शत्रु है तो तुम उसको शत्रु ही समझो।” (क़ुरआन 35:6)

शैतान की फुसफुसाहट हमें इस्लाम क़बूल करने से रोकने की कोशिश करती है। ये विचार किसी व्यक्ति के परम दयालु ईश्वर से जुड़ने या फिर से जुड़ने के रास्ते में नहीं आने चाहिए। इन लेखों की श्रृंखला में, हम कुछ सबसे प्रमुख मिथकों पर चर्चा करेंगे, उन्हें समीक्षा के लिए खुला रखेंगे, और देखेंगे कि ईश्वर वाकई सबसे दयालु है। वह इस्लाम को क़बूल करना आसान बनाता है, मुश्किल नहीं। कोई किंतु-परंतु नहीं!

1.    मैं मुसलमान होना चाहता हूं लेकिन मैं अपना नाम नहीं बदलना चाहता।

इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को अपना नाम बदलने की जरूरत नहीं है। पैगंबर मुहम्मद, ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे, ने कहा कि हर कोई एक अच्छे नाम का हकदार था, एक ऐसा नाम जिसका कोई मतलब या किरदार था। अधिकतर लोगों के लिए, यह कोई परेशानी की बात नहीं है, हालांकि, अगर आपको पता चलता है कि आपके नाम का गलत मतलब है या पापियों या अत्याचारियों के साथ जुड़ा है, तो नाम को अधिक स्वीकार्य में बदलना बेहतर है। अगर व्यक्ति का नाम किसी मूर्ति के नाम पर है या भगवान के अलावा किसी चीज या किसी और की गुलामी को दर्शाता है, तो उस नाम को बदलना होगा। हालांकि याद रखें कि इस्लाम काफी सरल है। अगर आपका नाम आधिकारिक तौर पर बदलने से परेशानी, मुश्किल या नुकसान होगा, तो इसे केवल मित्रों और परिवार के बीच ही बदलना काफी होगा।

2.     मैं मुसलमान होना चाहता हूं लेकिन मुझे अरबी भाषा नहीं आती

इस्लाम धर्म दुनिया के हर कोने में  सभी लोगों के लिए हर वक़्त मौजूद रहा है। यह केवल अरब या अरबी बोलने वालों का धर्म नहीं है। असल में, दुनिया के 1.4 अरब मुसलमानों में से अधिकतर मुसलमान अरब पृष्ठभूमि से नहीं हैं। कोई अरबी का एक भी शब्द जाने बिना मुसलमान बन सकता है; यह इस्लाम क़बूल करने की उसकी क्षमता को प्रभावित नहीं करता है। हालांकि, क़ुरआन की भाषा अरबी है और हर दिन आराधना अरबी में की जाती है, इसलिए बहरहाल पूरी भाषा सीखना आवश्यक नहीं है, इस्लाम क़बूल करने के बाद कुछ अरबी शब्दों को सीखना आवश्यक होगा।

अगर कोई व्यक्ति वाणी दोष या अरबी का उच्चारण करने में सक्षम ना होने के कारण इबादत करने के लिए पर्याप्त अरबी सीखने में असमर्थ है, तो उसे जितना हो सके उतना प्रयास करना चाहिए। कम से कम अगर कुछ अरबी शब्द सीखना संभव नहीं है, तो वह इस ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाता है, क्योंकि ईश्वर लोगों पर उतना बोझ नहीं डालता जितना कि वे सहन नहीं कर सकते। हालांकि, ईश्वर यह भी कहता हैं कि उन्होंने क़ुरआन को सीखना आसान बना दिया है, इसलिए एक व्यक्ति के लिए अपनी पूरी कोशिश करना अनिवार्य है।

“ईश्वर किसी पर दायित्व का भार नहीं डालता परन्तु उसकी सहन-शक्ति के अनुसार।” (क़ुरआन 2:286)

“और हमने क़ुरआन को उपदेश के लिए सरल कर दिया है,” (क़ुरआन 54:17)

एक आदमी पैगंबर के पास आया और कहा: "हे ईश्वर के दूत, मुझे क़ुरआन के बारे में कुछ सिखाओ जो मेरे लिए पर्याप्त होगा, क्योंकि मैं पढ़ नहीं सकता।" उन्होंने कहा, "कहो: सुब्हान-अल्लाह वल-हम्दु लिल्लाह वा ला इलाहा इल्लल्लाह वा अल्लाहु अकबर वा ला हवला वा ला कूवत इल्ला बिल्लाह (हर कमी को दूर करने वाला ईश्वर है, ईश्वर का गुणगान हो, ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है और ईश्वर सबसे महान है, ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है और ईश्वर के अलावा कोई शक्ति या ताक़त नहीं)।”[1]

इस्लाम की तह में प्रवेश करना आसान है। यह एक सरल प्रक्रिया है, जटिलताओं से मुक्त। भाग 2 में हम खतना पर चर्चा करेंगे, इस तथ्य पर कि इस्लाम में कोई जातीय या नस्ल प्रतिबंध नहीं है और इस्लाम के बारे में बहुत कुछ जाने बिना मुसलमान होना।


फ़ुटनोट्स:

[1] अबू दाउद, अन नसाई

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