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इस्लाम उदासी और चिंता से कैसे निपटता है (4 का भाग 3): कृतज्ञता

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विवरण: ईश्वर को उनके आशीर्वाद के लिए हर दिन धन्यवाद दें।

  • द्वारा Aisha Stacey (© 2010 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 825 (दैनिक औसत: 4)
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मनुष्य कमजोर होते हैं और अक्सर भय और चिंता से घिरे रहते हैं। कभी-कभी उदासी और चिंता हमारे जीवन को खतरे में डाल देती है। ये भावनाएं इतनी ज्यादा हो जाती हैं कि हम अपने जीवन का प्राथमिक उद्देश्य भूल जाते हैं, जो कि ईश्वर की पूजा करना है। जब ईश्वर को प्रसन्न करने का उद्देश्य हमारे सभी विचारों और कार्यों में होगा तो दुख और चिंता हमारे जीवन में आ ही नहीं सकते हैं।

पिछले लेख में हमने उदासी और चिंता से निपटने के लिए धैर्य रखने के बारे में चर्चा की। हमने ईश्वर के उन आशीर्वादों को भी भी याद करने की बात की जिससे धैर्य रखने में प्रोत्साहन मिलता है। दुख और चिंता पर काबू पाने का एक और तरीका है, ईश्वर के अनगिनत आशीर्वादों के लिए उनका आभारी होना। ईश्वर क़ुरआन में कहता है कि 'सच्चे उपासक वे हैं जो आभारी हैं और धन्यवाद देते हैं।

"इसलिए तुम मुझे (ईश्वर) याद रखो (प्रार्थना, महिमा द्वारा) और मैं तुम्हें याद रखूंगा, और मेरे प्रति आभारी रहो (मेरे अनगिनत एहसानों के लिए) और कभी भी नाशुक्री न करो।" (क़ुरआन 2:152)

आभार व्यक्त करने के कई तरीके हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण तरीका यह है कि ईश्वर की वैसे पूजा करो जैसा उसने बताया है। इस्लाम के पांच स्तंभ [1] हमें ईश्वर ने दिए हैं और वे हमारा आसानी से उनकी पूजा करने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। जब हम ईश्वर के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करते हैं, तो हम वास्तव में कितने धन्य हैं यह स्पष्ट हो जाता है।

जब हम इस बात की गवाही देते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई पूजा के योग्य नहीं है और मुहम्मद उनके अंतिम दूत है, तो हमें इस्लाम देने के लिए उनका आभारी होना चाहिए। जब कोई आस्तिक शांत प्रार्थना में ईश्वर के सामने झुकता है, तो वह आभार व्यक्त कर रहा होता है। रमजान के उपवास के दौरान, हम भोजन और पानी के लिए आभारी होते हैं जो ईश्वर हमें देता है। यदि कोई आस्तिक मक्का में ईश्वर के घर की तीर्थ यात्रा करने में सक्षम है, तो यह वास्तव में आभार व्यक्त करना है। हज यात्रा लंबी, कठिन और महंगी हो सकती है।

आस्तिक दान देकर भी आभार व्यक्त करता है। पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने अपने अनुयायियों को सलाह दी कि वे अपने शरीर के हर एक जोड़ या शक्ति के लिए ईश्वर का आभार व्यक्त करने के लिए प्रतिदिन दान दें।[2]  7वीं इस्लामी सदी के एक प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान इमाम इब्न रजब ने कहा, "मनुष्य को हर दिन पुण्य और दान के कार्य करके ईश्वर को उनके आशीर्वाद के लिए धन्यवाद देना चाहिए"

यदि हम क़ुरआन पढ़ के और उसके अर्थों पर विचार करके ईश्वर को याद करते हैं, तो हमें इस दुनिया और इसके बाद के जीवन का अधिक ज्ञान मिलता है। इससे हम इस जीवन के क्षणिक स्वभाव और इस तथ्य को समझना शुरू कर देते हैं कि परीक्षा और समस्या भी ईश्वर का आशीर्वाद है। ईश्वर की बुद्धि और न्याय कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी निहित है।

हमने कितनी बार दुर्बल करने वाली बीमारियों या विकलांगता से ग्रसित लोगों को उनकी स्थितियों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते सुना है, या बात करते सुना है कि किस तरह दर्द और पीड़ा उनके जीवन में आशीर्वाद और अच्छाई ले कर आई है। हमने कितनी बार दूसरों को भयानक अनुभवों और परीक्षाओं के बारे में बताते सुना है, क्या वे ईश्वर का शुक्र करना जारी रखते है?  

दुख और चिंता के समय जब हम अकेला और व्यथित महसूस करते हैं, तो ईश्वर ही हमारा एकमात्र सहारा होता है। जब उदासी और चिंता असहनीय हो जाती है, जब तनाव, भय, चिंता और दुख के अलावा कुछ नहीं बचता, तो हम सहज रूप से ईश्वर की ओर ध्यान केंद्रित करते हैं। हम जानते हैं कि उनके वचन सत्य हैं, हम जानते हैं कि उनका वादा सत्य है!

"... यदि तुम आभारी रहोगे तो मैं तुमको और अधिक दूंगा।" (क़ुरआन 14:7)

बुरे लोगों के साथ अच्छी चीजें क्यों होती हैं या अच्छे लोगों के साथ बुरी चीजें क्यों होती हैं, इसके पीछे का राज सिर्फ ईश्वर जानता है। सामान्य तौर पर जो कुछ भी हमें ईश्वर की ओर ले जाता है वह अच्छा होता है और हमें इसके लिए आभारी होना चाहिए। संकट के समय लोग ईश्वर के करीब आ जाते हैं, जबकि आराम के समय में हम अक्सर भूल जाते हैं कि आराम कहां से आया है। देने वाला ईश्वर है और वह सबसे उदार है। ईश्वर हमें कभी न खत्म होने वाले जीवन का उपहार देना चाहता है और यदि दर्द और पीड़ा स्वर्ग जाने की गारंटी है तो बीमारी और चोट एक आशीर्वाद है। पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने कहा, "यदि ईश्वर किसी का भला करना चाहता है तो वह उसकी परीक्षा लेता है।"[3]

पैगंबर मुहम्मद ने यह भी कहा, "मुसलमान पर कोई दुर्भाग्य या बीमारी नहीं आती, कोई चिंता या शोक या नुकसान या संकट नहीं आता - यहां तक कि एक कांटा भी नहीं चुभता - लेकिन ईश्वर इसकी वजह से उसके कुछ पापों को क्षमा कर देता है।" [4]  हम अपूर्ण मनुष्य हैं। हम इन शब्दों को पढ़ सकते हैं, हम भावना को भी समझ सकते हैं, लेकिन हर स्थिति के पीछे का ज्ञान जानकर भी हमारा अपनी परीक्षाओं लिए आभारी होना बहुत मुश्किल होता है। हमारा उदासी और चिंता में पड़ना बहुत आसान है। हालांकि हमारे सबसे दयालु ईश्वर ने हमें स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं और हमें दो चीजों का वादा किया है, यदि हम उनकी पूजा करते हैं और उनके आदेशों का पालन करते हैं तो हमें स्वर्ग दिया जाएगा और दूसरा ये कि कठिनाई के बाद आसानी आती है।

"तो वास्तव में, कठिनाई के साथ राहत है।" (क़ुरआन 94:5)

यह छंद क़ुरआन के उस अध्याय का हिस्सा है जो तब उतरा गया था जब पैगंबर मुहम्मद के मिशन की कठिनाइयां उन्हें निराश कर रही थीं और उन्हें परेशान कर रही थीं। ईश्वर के वचनों ने उन्हें ऐसे ही दिलासा दिया था और आश्वस्त किया था जैसे ये वचन आज हमें दिलासा देते हैं। ईश्वर हमें याद दिलाता है कि कठिनाई के साथ राहत है। कठिनाई कभी अकेले नहीं आती, इसमें हमेशा राहत होती है। इसके लिए हमें आभारी होना चाहिए। इसके लिए हमें अपना आभार व्यक्त करना चाहिए।

हमें उन परीक्षाओं, विजयों और समस्याओं को स्वीकार करना चाहिए जो जीवन का हिस्सा है। इनमें से हर एक, बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा ईश्वर का आशीर्वाद है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशिष्ट रूप से बनाया गया एक आशीर्वाद। जब हमें दुख या चिंता हो तो हमें ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, धैर्यवान और आभारी होने का प्रयास करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए। क्योंकि ईश्वर सबसे भरोसेमंद है। उन पर भरोसा करके हम किसी भी चिंता को दूर कर सकते हैं और हमारे जीवन में आने वाली किसी भी उदासी या कष्ट पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।



फुटनोट:

[1] विश्वास की गवाही (आस्था), प्रार्थना, रमजान में उपवास, अनिवार्य दान, तीर्थयात्रा।

[2] सहीह बुखारी

[3] सहीह बुखारी

[4] इबिड

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