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स्वर्गदूत (फ़रिश्ते) (3 का भाग 1): ईश्वर की पूजा करने और आज्ञा मानने के लिए पैदा किये गए

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  • द्वारा Aisha Stacey (© 2009 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 14 Nov 2021
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मुसलमान स्वर्गदूतों के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। इस्लाम में आस्था के छह स्तंभ हैं; एक और एकमात्र ईश्वर में विश्वास और जो कुछ भी मौजूद है उसका निर्माता और पालनकर्ता वही है, उनके स्वर्गदूतों, उनकी पुस्तकों, उनके दूतों, अंतिम दिन और दिव्य भाग्य में विश्वास।

स्वर्गदूत ऐसी दुनिया का हिस्सा हैं जिसे हम देख नही सकते, लेकिन मुसलमान उनके अस्तित्व में निश्चित रूप से विश्वास करते हैं क्योंकि ईश्वर और उनके दूत मुहम्मद ने हमें उनके बारे में बताया है। ईश्वर ने स्वर्गदूतों को ईश्वर की पूजा करने और आज्ञा मानने के लिए पैदा किया है।

"ये (स्वर्गदूत) अवज्ञा नहीं करते ईश्वर के आदेश की और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाये।" (क़ुरआन 66:6)

ईश्वर ने स्वर्गदूतों को प्रकाश से बनाया। पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने कहा, "स्वर्गदूतों को प्रकाश से बनाया गया है,"[1]  हमें इस बात का कोई ज्ञान नहीं है कि स्वर्गदूतों को कब पैदा किया गया था, हालांकि, हम जानते हैं कि उनको मानवजाति से पहले पैदा किया गया था। क़ुरआन बताता है कि ईश्वर ने स्वर्गदूतों को पृथ्वी पर एक ख़लीफ़ा बनाने के अपने इरादे के बारे में बताया। (क़ुरआन 2:30)

मुसलमान जानते हैं कि स्वर्गदूत सुंदर रचना है। क़ुरआन के छंद 53:6 मे ईश्वर ने स्वर्गदूतों का वर्णन धू मिर्राह के रूप मे किया है, यह एक अरबी शब्द है जिसे प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान[2]  'दिखने में लंबा और सुंदर' के रूप मे परिभाषित करते हैं। (क़ुरआन 12:31) भी पैगंबर युसूफ को एक महान दूत की तरह सुंदर बताता है।

स्वर्गदूतों के पंख होते हैं, और वे बहुत बड़े आकर के हैं। क़ुरआन या पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं में ऐसा कुछ भी नही है जो ये बताता हो कि स्वर्गदूत पंख वाले बच्चे हैं या स्त्री या पुरुष हैं।[3] हालांकि, हम जानते हैं कि स्वर्गदूत पंखों वाले हैं और कुछ बहुत बड़े हैं। पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं से हमें पता चलता है कि स्वर्गदूत जिब्रईल का आकार इतना बड़ा था कि उन्होंने "स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की जगह" को भर दिया था [4] और उनके छह सौ पंख थे [5].

"...किसने स्वर्गदूतों को बनाया, पंखों वाले दूत - दो-दो, या तीन-तीन, या चार-चार परों वाले..." (क़ुरआन 35:1)

स्वर्गदूतों के पद में भी अंतर हैं। वे स्वर्गदूत जो पहली लड़ाई यानि बद्र की लड़ाई में उपस्थित थे, उन्हें "सर्वश्रेष्ठ" स्वर्गदूत माना जाता है।

"देवदूत जिब्रईल पैगंबर के पास आये और पूछा, 'आप उन लोगों को कैसे आंकते हैं जो बद्र में मौजूद थे?' मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने जवाब दिया, 'वे मुसलमानों में सबसे अच्छे हैं, ' या कुछ इसी समान। तब जिब्रईल ने कहा: 'ऐसा ही उन स्वर्गदूतों के साथ है जो बद्र में उपस्थित थे।'"[6]

मुसलमानों का मानना है कि स्वर्गदूतों को खाने-पीने की आवशयकता नहीं होती। उनका अन्न ईश्वर की महिमा करना है और ये गुणगान करना है कि ईश्वर के सिवा कोई और पूजायोग्य नहीं है। (क़ुरआन 21:20)

"... तुम्हारे पालनहार के पास वो हैं जो रात और दिन उसकी पवित्रता का वर्णन करते रहते हैं, और वे थकते नहीं हैं।" (क़ुरआन 41:38)

क़ुरआन में पैगंबर इब्राहिम की कहानी यह भी बताती है कि स्वर्गदूतों को खाने की कोई जरूरत नहीं होती। जब स्वर्गदूत आदमी के रूप में पैगंबर इब्राहीम को एक पुत्र के जन्म की शुभ सूचना देने गए, तो इब्राहिम ने उनके सम्मान में खाने के लिए एक बछड़ा भेंट किया। उन्होंने खाने से इनकार कर दिया, और इब्राहीम डर गए, तब उन्होंने बताया की वे स्वर्गदूत हैं। (क़ुरआन 51:26-28)

स्वर्गदूतों (फ़रिश्ते) की संख्या बहुत है, लेकिन इसका ज्ञान सिर्फ ईश्वर को ही है। स्वर्ग में अपने स्वर्गारोहण के दौरान, पैगंबर मुहम्मद ने पूजा के एक घर का दौरा किया, जिसे 'बार-बार आने वाला घर' कहा जाता है, इसे अरबी मे अल बैतुलमामूर कहते हैं जो स्वर्ग में काबा [7] के बराबर है।

फिर मुझे 'बार-बार आने वाले घर' में ले जाया गया: यहां हर दिन सत्तर हजार स्वर्गदूत आते हैं और चले जाते हैं, वो फिर कभी यहां वापस नही आते हैं, उनके बाद दूसरा समूह आता है।"[8]

पैगंबर मुहम्मद ने हमें यह भी बताया कि क़यामत के दिन लोगों को नरक दिखाया जाएगा। उन्होंने कहा, "उस दिन सत्तर हजार रस्सियों से बांध के नरक को निकाला जाएगा, और प्रत्येक रस्सी को सत्तर हजार स्वर्गदूत खींचेंगे।"[9]

स्वर्गदूतों में बहुत शक्तियां होती हैं। उनमें विभिन्न रूप धारण करने की क्षमता होती है। वे पैगंबर इब्राहिम और पैगंबर लूत दोनों के सामने आदमी के रूप में आए थे। स्वर्गदूत जिब्रईल एक आदमी के रूप में यीशु की माँ मरियम के सामने प्रकट हुए थे, (क़ुरआन 19:17) और वह पैगंबर मुहम्मद के सामने एक ऐसे व्यक्ति के रूप में आये जिसके कपड़े अत्यधिक सफेद थे, और जिसके बाल अत्यधिक काले थे। [10]

स्वर्गदूत ताकतवर होते हैं। चार स्वर्गदूत ईश्वर के सिंहासन को ढोते हैं, और न्याय के दिन उनकी संख्या बढ़ाकर आठ कर दी जाएगी। पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं में एक वर्णन है जो ईश्वर के सिंहासन को ले जाने वाले स्वर्गदूतों में से एक का वर्णन करता है। "उसके कानों और उसके कंधों के बीच की दूरी सात सौ साल की यात्रा के बराबर है।"[11]

स्वर्गदूत विभिन्न कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को निभाते हैं। कुछ पर ब्रह्मांड के मामलों की जिम्मेदारी है। कुछ पर समुद्र, या पहाड़ों या हवा की जिम्मेदारी है। मक्का के पास के एक शहर ताइफ़ का दौरा करने के बाद, एक बार पैगंबर मुहम्मद पर पथराव किया गया। स्वर्गदूत जिब्रईल और पहाड़ों के देवदूत ने उससे भेंट की।

पहाड़ों के देवदूत ने पास के दो पहाड़ों को मिलाकर इन अड़ियल लोगों को नष्ट करने का प्रस्ताव दिया। पैगंबर मुहम्मद ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि अगर इन्हें इस्लाम को देखने और समझने का मौका मिले तो वे इसे अपना लेंगे और ईश्वर से प्रेम करने लगेंगे।[12]

स्वर्गदूत बिना किसी झिझक के ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं। प्रत्येक स्वर्गदूत का एक कर्तव्य या कार्य होता है। कुछ स्वर्गदूत मनुष्यों की रक्षा करते हैं और उनका साथ देते हैं, और अन्य दूत होते हैं। दूसरे भाग में हम इन कर्तव्यों की चर्चा करेंगे और कुछ स्वर्गदूतों के नाम बताएंगे जो ये कर्तव्य निभाते हैं।

 

 



फुटनोट:

[1] सहीह मुस्लिम।

[2] इब्न अब्बास और क़ुतादह।

[3] स्वर्गदूत के लिए 'उसका' शब्द का प्रयोग व्याकरणिक सहजता के लिए है और किसी भी तरह से यह नहीं दर्शाता कि स्वर्गदूत पुरुष हैं।

[4] सहीह मुस्लिम

[5] इमाम अहमद की मुसनद।

[6] सहीह अल-बुखारी

[7] सऊदी अरब के मक्का शहर में पवित्र मस्जिद के केंद्र में घन के आकार की इमारत।

[8] सहीह अल-बुखारी

[9] सहीह मुस्लिम

[10] इबिड

[11] सुनन अबू-दाऊद

[12] सहीह अल-बुखारी, सहीह मुस्लिम

 

 

स्वर्गदूत (3 का भाग 2): ईश्वर ने स्वर्गदूतों (फ़रिश्ते) को प्रभाव और शक्ति प्रदान की

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ईश्वर ने स्वर्गदूतों को प्रकाश से बनाया है। वे अपने लिए निर्धारित कर्तव्यों को बिना झिझक के पूरा करते हैं। मुसलमानों को स्वर्गदूतों के बारे मे क़ुरआन और पैगंबर मुहम्मद की प्रामाणिक परंपराओं से पता चलता है। हमने पहले भाग में बताया कि स्वर्गदूत पंखों वाले सुंदर प्राणी हैं, जो विभिन्न आकार के होते हैं और ईश्वर की अनुमति से अपना रूप बदलने में सक्षम होते हैं। स्वर्गदूतों के नाम हैं और कर्तव्य हैं जिन्हें उन्हें निभाना होता है।

मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के लिए सबसे अधिक परिचित नाम जिब्रईल है। स्वर्गदूत जिब्रईल को यहूदी और ईसाई दोनों परंपराओं में एक महादूत और ईश्वर का दूत बताया गया है, और तीनों एकेश्वरवादी धर्मों में उनका [1] पद महान है।

"वास्तव में ये (क़ुरआन) एक सम्माननीय स्वर्गदूत द्वारा ईश्वर की ओर से पैगंबर मुहम्मद तक लाया हुआ कथन है। शक्तिशाली है, अर्श (सिंहासन) के मालिक के पास उच्च पद वाला है। जिसकी बात स्वर्गदूत मानते हैं और बड़ा भरोसेमंद है।" (क़ुरआन 81:19-21)

ईश्वर के शब्द (क़ुरआन) को पैगंबर मुहम्मद तक जिब्रईल लेकर आये थे।

"... जिब्रईल ने ईश्वर की अनुमति से इस संदेश (क़ुरआन) को आपके दिल पर उतारा है, जो इससे पूर्व की सभी पुस्तकों का प्रमाण है तथा विश्वासियों के लिए मार्गदर्शन और शुभ समाचार है।" (क़ुरआन 2:97)

स्वर्गदूत मिकाइल पर बारिश की जिम्मेदारी है और इसराफील वो स्वर्गदूत हैं जो क़यामत के दिन तुरही फूकेंगे। ये तीनों अपने कर्तव्यों के महान महत्व के कारण स्वर्गदूतों में सबसे महान हैं। उनके प्रत्येक कर्तव्य जीवन के एक पहलू से संबंधित है। स्वर्गदूत जिब्रईल क़ुरआन को ईश्वर से पैगंबर मुहम्मद तक लाये, और क़ुरआन दिल और आत्मा का पोषण करता है। स्वर्गदूत मिकाइल पर बारिश की जिम्मेदारी है, ये बारिश पृथ्वी का पोषण करती है और इस प्रकार हमारे भौतिक शरीर का भी। स्वर्गदूत इसराफील पर तुरही फूंकने की जिम्मेदारी है और यह तुरही स्वर्ग या नरक में हमेशा के जीवन की शुरुआत का संकेत देती है।

जब पैगंबर मुहम्मद रात में प्रार्थना करने के लिए उठते तो वो अपनी प्रार्थना की शुरुआत इन शब्दों से करते, "हे ईश्वर; जिब्रईल, मिकाइल और इसराफील के स्वामी; आकाश और पृथ्वी के निर्माता, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष को जानने वाले। आप उन मामलों के न्यायाधीश हैं जिनमें आपके दास भिन्न हैं। अपनी अनुमति से सत्य के विवादित मामलों में मेरा मार्गदर्शन करें, क्योंकि आप जिसे चाहते हैं उसे सीधे मार्ग पर ले जाते हैं।”[2]

हम कई अन्य स्वर्गदूतों के नाम भी जानते हैं। स्वर्गदूत मलिक नरक के द्वारपाल हैं। "वे [नरक में लोग] रोएंगे: 'हे मलिक! क्या तेरा ईश्वर हमारा अंत करेगा! ...।" (क़ुरआन 43:77) मुनकर और नकीर वे स्वर्गदूत हैं जो लोगों से उनकी क़ब्रों में सवाल करेंगे। हम इन नामों को जानते हैं और समझते हैं कि कब्र में स्वर्गदूत हमसे सवाल करेंगे क्योंकि ये पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं में वर्णित है।

“जब मृतक को दफनाया जायेगा, तो उसके पास दो नीले-काले स्वर्गदूत आएंगे, जिनमें से एक का नाम मुनकर होगा और दूसरे का नकीर। वे पूछेंगे, 'तुम इस आदमी के बारे में क्या कहते थे?' और वो कहेगा कि: 'वह दास और ईश्वर का दूत है: मैं गवाही देता हूं कि ईश्वर के सिवा कोई देवता नही है और मुहम्मद उनके दास और दूत हैं। वे कहेंगे, 'हम पहले से जानते थे कि तुम यह कहते थे।' तब उसकी कब्र उसके लिए सत्तर हाथ चौड़ी और लंबी की जाएगी, और प्रकाशित की जाएगी। तब वे उससे कहेंगे, 'सो जाओ।' वह कहेगा, 'मेरे परिवार के पास वापस जाओ और उन्हें बताओ।' वे उससे कहेंगे, 'एक दूल्हे की तरह सो जाओ और तुम्हे सबसे अधिक प्रेम करने वाले के सिवा कोई तब तक नहीं उठाएगा' जब तक कि ईश्वर तुम्हे न उठाए। ..." [3]

क़ुरआन में हमें हारूत और मारूत नाम के दो स्वर्गदूतों की कहानी मिलती है, जिन्हें लोगों को जादू सिखाने के लिए बाबिल भेजा गया था। इस्लाम में जादू का इस्तेमाल करना मना है लेकिन इन स्वर्गदूतों को लोगों की परीक्षा के लिए भेजा गया था। जादू दिखाने या सिखाने से पहले हारूत और मारूत ने बाबिल के निवासियों को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि उन्हें परीक्षा लेने के लिए भेजा गया है, और जादू सीखने वालो का परलोक में कोई हिस्सा नहीं होगा, यानी वे नरक में जाएंगे। (क़ुरआन 2:102)

यद्यपि कभी-कभी यह माना जाता है कि मृत्यु के दूत का नाम इज़राइल है, क़ुरआन या पैगंबर मुहम्मद की प्रामाणिक परंपराओं में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इसे साबित करता हो। हम मृत्यु के दूत का नाम नहीं जानते, लेकिन हम उनके कर्तव्य को जानते हैं और जानते हैं कि उनके सहायक हैं।

"आप कह दें कि तुम्हारे प्राण निकाल लेगा मौत का दूत, जो तुमपर नियुक्त किया गया है, फिर तुम्हे तुम्हारे पालनहार के पास ले जाया जायेगा।” (क़ुरआन 32:11)

"जब तुम्हारी मौत का समय आता है, तो हमारे स्वर्गदूत (अर्थात मृत्यु के दूत और उसके सहायक) तुम्हारे प्राण ले लेते हैं और वह तनिक भी आलस्य नहीं करते। और फिर वे अपने स्वामी, न्यायी ईश्वर के पास वापस चले आते हैं।" (क़ुरआन 6:61-62)

स्वर्गदूतों का एक समूह है जो पूरी दुनिया मे घूमता है और ईश्वर को याद करने वाले लोगों को खोजता है। पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं से हमें पता चलता है कि, "ईश्वर के पास स्वर्गदूत हैं जो उसे याद करने वाले लोगों की तलाश मे घूमते हैं। जब वे लोगों को ईश्वर को याद करते हुए पाते हैं, तो वे एक दूसरे को पुकारते हैं, "आओ तुम जिसकी तलाश में आये हो!" और वे उन्हें अपने पंखों से ढांपते हुए निचले आकाश तक जाते हैं। तब उनका ईश्वर पूछता है जबकि वह उनसे बेहतर जानने वाला है, "मेरे दास क्या कह रहे हैं?" वे कहते हैं: “वे तेरी महिमा, बड़ाई, प्रशंसा और गुणगान कर रहे हैं।” वह पूछता है, "क्या उन्होंने मुझे देखा है?" वे कहते हैं, "नहीं, आपकी कसम, उन्होंने आपको नहीं देखा है।" वह पूछता है, "और अगर उन्होंने मुझे देखा होता तो क्या करते?" वे कहते हैं, "वे आपकी प्रशंसा और पूजा में और भी अधिक उत्साही और समर्पित होते।" वह पूछता है, "वे मुझसे क्या मांग रहे हैं?" वे कहते हैं, "वे आपसे स्वर्ग मांग रहे हैं।" वह पूछता है, "और क्या उन्होंने इसे देखा है?" वे कहते हैं, "नहीं, आपकी कसम हे ईश्वर उन्होंने इसे नहीं देखा है।" वह पूछता है, "और अगर उन्होंने इसे देखा होता तो क्या करते?" वे कहते हैं: “वे इसके लिए और भी अधिक लालायित (उत्सुक) होते तथा और अधिक यत्न से तुझ से बिनती करते।” वह पूछता है, "और वे किससे मेरी सुरक्षा चाहते हैं?" वे कहते हैं, "नरक की आग से।" वह पूछता है, "क्या उन्होंने इसे देखा है?" वे कहते हैं, "नहीं, आपकी कसम उन्होंने इसे नहीं देखा है।" वह पूछता है, "और अगर उन्होंने इसे देखा होता तो क्या करते?" वे कहते हैं: “वे उससे और अधिक डरते और उससे बचने के लिए व्याकुल होते।” ईश्वर कहता है: "तुम गवाह हो कि मैंने उन्हें क्षमा कर दिया है।" उनमें से एक स्वर्गदूत कहता है: “वास्तव मे कुछ लोग उनमें से नही हैं; वह बस किसी और कारण से सभा मे आये हैं।” अल्लाह कहता है, "वे सब शामिल थे, और उनमें से सभी को क्षमा किया जाएगा।"[4]

मुसलमानों का मानना है कि स्वर्गदूतों को मनुष्यों से संबंधित विशेष कर्तव्य निभाने होते हैं। स्वर्गदूत मनुष्यों की रक्षा करते हैं, और दो स्वर्गदूत अच्छे और बुरे कामों को लिखते हैं। वे प्रार्थनाओं के साक्षी होते हैं और एक पर तो गर्भ में भ्रूण की जिम्मेदारी होती है। भाग तीन में हम और अधिक विस्तार में जाएंगे और स्वर्गदूतों और मनुष्यों के बीच के संबंधों को बताएंगे।



फुटनोट:

[1] स्वर्गदूत के लिए 'उसका' शब्द का प्रयोग व्याकरणिक सहजता के लिए है और किसी भी तरह से यह नहीं दर्शाता कि स्वर्गदूत पुरुष हैं।

[2] सहीह मुस्लिम

[3] सुनन अत थिरमिधि। अबू इसा ने कहा: यह एक ग़रीब हसन हदीस है। इसे सहीह अल-जामी में हसन बताया गया है', नंबर 724।

[4] सहीह अल-बुखारी

 

 

स्वर्गदूत (3 का भाग 3): स्वर्गदूतों (फ़रिश्ते) द्वारा संरक्षित

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विवरण: स्वर्गदूतों और मानवजाति के बीच संबंध

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मुसलमानों का मानना है कि स्वर्गदूत इंसानों के जीवन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यह गर्भधारण के तुरंत बाद शुरू होता है और मृत्यु के क्षण तक जारी रहता है। यहां तक कि स्वर्गदूत और मनुष्य परलोक में बातचीत भी करते हैं। स्वर्गदूत लोगों को स्वर्ग में ले जाते हैं और ये नरक के द्वार पर भी होते हैं। स्वर्गदूतों पर विश्वास करना इस्लाम की मौलिक विश्वास में से एक है।

पैगंबर मुहम्मद की परंपराओं से हमें पता चलता है कि गर्भधारण के कुछ महीने बाद ईश्वर की अनुमति से उसमें जीवन डाला जाता है। फिर एक स्वर्गदूत इस इंसान के कर्मों की किताब में चार सवालों के जवाब लिखता है। क्या यह नर होगा या मादा? क्या यह व्यक्ति सुखी होगा या दुखी? उसका जीवन काल कितना लंबा होगा, और क्या यह व्यक्ति अच्छे कर्म करेगा या बुरे?[1]

स्वर्गदूतों (फ़रिश्ते) पर लोगों की जीवन भर रक्षा करने की जिम्मेदारी होती है।

"प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके आगे और पीछे स्वर्गदूत हैं, जो अल्लाह के आदेश पर उसकी रक्षा करते हैं।” (क़ुरआन 13:11)

प्रत्येक व्यक्ति पर दो हिसाब रखने वाले स्वर्गदूत हैं। ये स्वर्गदूत सम्मानित लेखक हैं और उनका कर्तव्य है कि वे सभी अच्छे और बुरे कर्मों को लिखें। 

"... और वह (ईश्वर) तुम्हारे ऊपर रखवाले (रखवाली करने और अच्छे और बुरे कर्मों को लिखने वाले स्वर्गदूत) भेजता है ...।" (क़ुरआन 6:61)

"क्या वे समझते हैं कि हम नहीं सुनते हैं उनकी गुप्त बातों तथा परामर्श को? बिलकुल सुनते हैं, बल्कि हमारे स्वर्गदूत उनके पास ही हैं और लिख रहे हैं।" (क़ुरआन 43:80)

"जबकि उसके दायें और बायें ओर दो स्वर्गदूत लिख रहे हैं (प्रत्येक मनुष्य की युवावस्था की आयु के बाद)। वह एक शब्द भी नहीं बोलता है, मगर उसे लिखने के लिए उसके पास एक निरीक्षक तैयार है।" (क़ुरआन 50:17-18)

"लेकिन वास्तव में, तुमपर निरीक्षक नियुक्त हैं, जो माननीय लेखक हैं और तुम्हारे कर्मों को लिख रहे हैं।" (क़ुरआन 82:10-11)

स्वर्गदूत एक सम्मानजनक लेकिन सख्त तरीके से लिखते हैं। ऐसा कुछ भी नही है जो वे न लिखते हों। हालांकि, हमेशा की तरह इसमें भी ईश्वर की दया स्पष्ट है। पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने समझाया कि ईश्वर ने अच्छे और बुरे कर्मों को लिखने के नियम को परिभाषित किया है और उसका विवरण दिया है। "जो व्यक्ति अच्छा काम करने की सोचता है लेकिन कर नहीं पाता, वह उसके लिए पूरे अच्छे काम के रूप में लिखा जायेगा। यदि उसने वास्तव में अच्छा काम किया तो यह दस अच्छे कर्मों के रूप मे लिखा जायेगा, या सात सौ गुना या उससे भी अधिक तक। यदि कोई व्यक्ति कोई बुरा काम करने की सोचता है, लेकिन करता नहीं है, तो यह एक अच्छे काम के रूप में लिखा जायेगा, जबकि अगर उसने विचार किया और उस पर अमल भी किया, तो यह एक ही बुरे काम के रूप में लिखा जायेगा।"[2]

प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान इब्न काथिर ने क़ुरआन के छंद 13:10-11 पर यह कहते हुए टिप्पणी की, "प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर स्वर्गदूत हैं जो बारी-बारी से रात और दिन उसकी रक्षा करते हैं, जो उसे शैतान और दुर्घटनाओं से बचाते हैं, उसी तरह अन्य स्वर्गदूत हैं जो बारी-बारी से उसके अच्छे और बुरे कर्मों को रात और दिन मे लिखते हैं।”

“दाईं तथा बाईं ओर दो स्वर्गदूत हैं जो उसके कर्मों को लिखते हैं। दाईं ओर वाला अच्छे कर्म लिखता है और बाईं ओर वाला बुरे कर्म लिखता है। दो अन्य स्वर्गदूत उसकी रक्षा करते हैं, एक पीछे से और एक सामने से। तो दिन के समय चार स्वर्गदूत होते हैं, और रात के समय दूसरे चार स्वर्गदूत होते हैं।”

प्रत्येक मनुष्य के साथ हर समय रहने वाले चार स्वर्गदूतों के अलावा, अन्य स्वर्गदूत लगातार मनुष्यों के पास आते-जाते रहते हैं। पैगंबर मुहम्मद अपने अनुयायियों को याद दिलाते हैं कि स्वर्गदूत मनुष्यों के पास लगातार आते-जाते रहते हैं। उन्होंने कहा, "स्वर्गदूत तुम्हारे पास रात और दिन के हिसाब से आते हैं और वे सभी फज्र (सुबह) और असर (दोपहर) की प्रार्थना के समय एक साथ इकट्ठे होते हैं। जो आपके साथ रात गुजार चुके हैं (या आपके साथ रहे हैं) वो आसमान पर जाते हैं और ईश्वर हालांकि तुम्हारे बारे में सब कुछ अच्छी तरह से जानता है लेकिन फिर भी उनसे पूछता हैं, "तुमने मेरे दासों को किस अवस्था में छोड़ा है?" स्वर्गदूत जवाब देते हैं: "जब हमने उन्हें छोड़ा तो वे प्रार्थना कर रहे थे और जब हम उनके पास पहुंचे तो भी वे प्रार्थना कर रहे थे।"[3] वे प्रार्थना देखने और क़ुरआन के छंद सुनने के लिए इकट्ठा होते हैं।

इसलिए यह समझा जा सकता है कि स्वर्गदूत मनुष्य के जीवन से बहुत अधिक जुड़े हुए हैं और यह जुड़ाव उस समय भी समाप्त नही होता जब मृत्यु का दूत आत्मा को ले जाता है, और न ही तब समाप्त होता है जब स्वर्गदूत मृत व्यक्ति से उसकी कब्र में सवाल पूछता है [4].  स्वर्गदूत स्वर्ग के द्वारपाल हैं।

"और जो लोग अपने ईश्वर के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करते हैं, उन्हें समूहों में स्वर्ग में ले जाया जाएगा, जब वो वहां पहुंचेंगे, उसके द्वार खोल दिए जाएंगे और उसके रखवाले कहेंगे: अस्सलामु अलैकुम (ईश्वर की शांति आप पर हो!)। तुमने अच्छे कर्म किये हैं, इसलिए वहां हमेशा रहने के लिए जाओ।” (क़ुरआन 39:73)

"और हर द्वार से स्वर्गदूत उनके पास 'अस्सलामु अलैकुम (ईश्वर की शांति आप पर हो)' कहते हुए आएंगे, क्योंकि उन्होंने धैर्य बनाए रखा! वास्तव में ये परलोक का घर कितना उत्कृष्ट है!" (क़ुरआन 13:23-24)

स्वर्गदूत नरक के भी द्वारपाल हैं।

"और तुम क्या जानो कि नरक क्या है? यह किसी भी पापी को नहीं छोड़ेगी, और न ही जलाये बिना छोड़ेगी। वह खाल झुलसा देने वाली है। नियुक्त हैं उनपर उन्नीस संरक्षक (दूत)। और हमने नरक के रक्षक स्वर्गदूत ही बनाये हैं और उनकी संख्या को अविश्वासियों के लिए परीक्षा बना दिया है ताकि लोग विश्वास करें और विश्वास करने वालों के विश्वास में बढ़ोतरी हो।" (क़ुरआन 74:27-31)

ईश्वर ने स्वर्गदूतों को प्रकाश से बनाया है। वे ईश्वर की अवज्ञा नहीं कर सकते और बिना हिचकिचाहट या झिझक के ईश्वर के आदेशों का पालन करते हैं। स्वर्गदूत ईश्वर की पूजा करते हैं और यही उनका अन्न होता है। ये महान जीव मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे रक्षा करते हैं, कर्म लिखते हैं और रिपोर्ट करते हैं, और उन मनुष्यों के साथ इकट्ठा होते हैं जो ईश्वर को याद करते हैं। 



फुटनोट:

[1] सहीह अल-बुखारी

[2] सहीह अल-बुखारी, सहीह मुस्लिम

[3] इबिड।

[4] भाग 2 देखें

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