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बीमार होने पर कैसा व्यवहार करें (2 का भाग 1): धैर्य के साथ कष्ट को सहना

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विवरण: ईश्वर की अनुमति के बिना इंसान को कोई भी बीमारी या चोट नहीं लग सकती।

  • द्वारा Aisha Stacey (© 2009 IslamReligion.com)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 258 (दैनिक औसत: 3)
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एक आस्तिक बीमार या घायल होने पर कैसे व्यवहार करता है, इस बारे में बात करने से पहले यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस्लाम हमें इस दुनिया के जीवन के बारे में क्या सिखाता है। पृथ्वी का यह जीवन परलोक में हमारे वास्तविक जीवन के रास्ते पर एक कुछ समय का पड़ाव है। स्वर्ग या नरक हमारा स्थायी ठिकाना है। यह दुनिया हमारे इम्तेहान की जगह है। ईश्वर ने इसे हमारे आनंद के लिए बनाया है, लेकिन यह सिर्फ सांसारिक सुखों के स्थान से अधिक कुछ भी नहीं है। यहीं पर हम अपना असली उद्देश्य पूरा करते हैं; हम अपना जीवन ईश्वर की पूजा के आधार पर जीते हैं। हम हंसते हैं, खेलते हैं, रोते हैं और दिल का दर्द और दुख महसूस करते हैं, लेकिन हर परिस्थिति और हर भावना ईश्वर की ओर से है। हम धैर्य और कृतज्ञता के साथ प्रतिक्रिया करते हैं और कभी न ख़त्म होने वाला इनाम पाने की आशा करते हैं। हम कभी न ख़त्म होने वाले दंड से डरते हैं और निश्चित रूप से जानते हैं कि ईश्वर ही सभी दया और सभी क्षमा का स्रोत है।

"और दुनिया का यह जीवन केवल मनोरंजन और खेल है! वास्तव में परलोक का घर ही वास्तविक जीवन है (अर्थात परलोक का जीवन कभी समाप्त नहीं होगा), अच्छा होता यदि वे जानते।" (क़ुरआन 29:64)

ईश्वर ने हमें बना के सिर्फ जीवन के सुखों और परीक्षणों के लिए नहीं छोड़ दिया; बल्कि उसने हमें सिखाने के लिए दूतों और पैगंबरो को भेजा और हमारे मार्गदर्शन के लिए रहस्योद्घाटन की पुस्तकें भेजी। उन्होंने हम पर अनगिनत कृपा भी करी। प्रत्येक कृपा जीवन को अद्भुत और कभी-कभी सहने योग्य बनाती है। यदि हम एक पल के लिए रुक कर अपने अस्तित्व पर विचार करें तो ईश्वर की कृपा स्पष्ट पता चलेगी। बाहर गिरने वाली बारिश को देखें, अपनी त्वचा पर धूप को महसूस करें, अपनी छाती को स्पर्श करें और अपने दिल की लयबद्ध धड़कन को महसूस करें। ये ईश्वर की कृपा ही हैं और हमें अपने घरों, अपने बच्चों और अपने स्वास्थ्य के अलावा इनके लिए भी आभारी होना चाहिए। परन्तु ईश्वर हमें बताता है कि हमारी परीक्षा ली जाएगी, वह कहते हैं,

"और निश्चय ही हम भय, भूख, धन, जीवन और फलों की हानि के जरिये तुम्हारी परीक्षा लेंगे, परन्तु धैर्य रखने वालों को इनाम देंगे।" (क़ुरआन 2:155)

ईश्वर ने हमें अपनी परीक्षाओं और समस्याओं को धैर्यपूर्वक सहने की सलाह दी है। हालांकि यह मुश्किल है यह समझे बिना कि इस दुनिया में जो कुछ भी होता है वह ईश्वर की अनुमति से होता है। ईश्वर की आज्ञा के बिना पेड़ से कोई पत्ता भी नहीं गिरता। ईश्वर की अनुमति के बिना कोई भी व्यवसाय खत्म नहीं होता, कोई कार दुर्घटनाग्रस्त नहीं होती, और कोई भी विवाह समाप्त नहीं होता। ईश्वर की अनुमति के बिना कोई भी बीमारी या चोट इंसान को नहीं लगती। सभी चीजों पर उसका अधिकार है। ईश्वर जो भी करता है वह किसी कारण से करता है जो कभी-कभी हमारी समझ से परे होते हैं और ये कारण स्पष्ट हो भी सकते हैं या नहीं भी। हालांकि, ईश्वर अपने अनंत ज्ञान और दया से वही करते हैं जो हमारे लिए सबसे अच्छा हो। अंततः हमारे लिए जो सबसे अच्छा है वह है कभी न खत्म होने वाला जीवन और सुख अर्थात स्वर्ग।

"उन्हें उनका ईश्वर शुभ सूचना देता है अपनी दया और प्रसन्नता की तथा ऐसे स्वर्गों की जिनमें स्थायी सुख के साधन हैं।" (क़ुरआन 9:21)

एक आस्तिक हर परीक्षा की घड़ी में निश्चित रहता है कि ईश्वर उसके लिए अच्छा ही करेगा। ये अच्छाई इस दुनिया के सुखों में से हो सकती है या यह परलोक में हो सकती है। पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने कहा, "वास्तव में एक विश्वास करने वाले की बातें आश्चर्यजनक हैं! ये सभी उसके फायदे के लिए हैं। अगर उसके जीवन में कुछ अच्छा होता है तो वह आभारी होता है, और यह उसके लिए अच्छा है। और यदि उसके साथ कुछ बुरा होता है, तो वह धैर्य से सहन करता है और यह भी उसके लिए अच्छा है।"[1]  ईश्वर जीवन की परीक्षाओं और समस्याओं के जरिये हमारी परीक्षा लेते हैं, और यदि हम धैर्यपूर्वक सहन करेंगे तो हमें अच्छा इनाम मिलेगा। बदलती परिस्थितियों और कठिन समय के माध्यम से ईश्वर हमारे विश्वास के स्तर की परीक्षा लेते हैं, धैर्य रखने की हमारी क्षमता देखते हैं और हमारे कुछ पापों को मिटा देते हैं। ईश्वर प्यार करने वाले और बुद्धिमान हैं और हमको हम से बेहतर जानते हैं। हमें उनकी दया के बिना स्वर्ग नहीं मिलेगा और उनकी दया इस जीवन की परीक्षाओं और समस्याओं में है।

इस संसार का जीवन तो केवल छलावा है। हमारे लिए सबसे फायदेमंद चीज वो अच्छे कर्म हैं जिन्हें हमने किया था। परिवार एक परीक्षा है, क्योंकि ईश्वर कहते हैं कि ये हमें भटका सकते हैं, लेकिन ये हमें स्वर्ग में भी ले जा सकते हैं। धन एक परीक्षा है; इसका लालच हमें लालची और कंजूस बना सकता है, लेकिन इसे बांटना और इसका इस्तेमाल ज़रूरतमंदों के लिए करना हमें ईश्वर के करीब ला सकता है। स्वास्थ्य भी एक परीक्षा है। अच्छे स्वास्थ्य से हम अजेय महसूस कर सकते हैं और हमें लग सकता है कि ईश्वर की आवश्यकता नहीं है, लेकिन खराब स्वास्थ्य हमें विनम्र बनाता है और हमें ईश्वर पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करता है। एक आस्तिक जीवन की परिस्थितियों में कैसा व्यवहार करता है यह बहुत महत्वपूर्ण है।

क्या होगा अगर इस जीवन के सुख अचानक पीड़ा बन जाएं? बीमारी या चोट लगने पर व्यक्ति को कैसा व्यवहार करना चाहिए? बेशक हम अपने भाग्य को स्वीकार करते हैं और दर्द, उदासी या पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करने का प्रयास करते हैं क्योंकि हम निश्चित रूप से जानते हैं कि ईश्वर इससे हमारा अच्छा करेगा। पैगंबर मुहम्मद ने कहा, "मुसलमान पर कोई दुर्भाग्य या बीमारी नहीं आती, कोई चिंता या शोक या नुकसान या संकट नहीं आता - यहां तक कि एक कांटा भी नहीं चुभता - लेकिन ईश्वर इसकी वजह से उसके कुछ पापों को क्षमा कर देता है।"[2]  हालांकि हम अपूर्ण मनुष्य हैं। हम इन शब्दों को पढ़ सकते हैं, हम भावना को भी समझ सकते हैं, लेकिन स्वीकृति के साथ व्यवहार करना कभी-कभी बहुत कठिन होता है। हमारा अपनी स्थिति को देख के दुखी होना और रोना बहुत आसान है, लेकिन हमारे सबसे दयालु ईश्वर ने हमें स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं और हमें दो चीजों का वादा किया है, यदि हम उनकी पूजा करते हैं और उनके आदेशों का पालन करते हैं तो हमें स्वर्ग दिया जाएगा और दूसरा ये कि कठिनाई के बाद आसानी आती है।

"तो वास्तव में, कठिनाई के साथ राहत है।" (क़ुरआन 94:5)

एक आस्तिक अपने शरीर और मन की देखभाल करने के लिए बाध्य है, इसलिए उसके लिए अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखना आवश्यक है। लेकिन जब बीमारी या चोट लग जाती है तो ईश्वर के मार्गदर्शन का पालन करना अत्यावश्यक है। एक आस्तिक को चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए और इलाज या ठीक होने के लिए वह सब करना चाहिए जो वो कर सकता है, लेकिन साथ ही उसे प्रार्थना, ईश्वर की याद और पूजा के माध्यम से मदद लेनी चाहिए। इस्लाम जीवन जीने का एक समग्र तरीका है, शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य दोनों साथ-साथ चलते हैं। भाग दो में हम बीमारी या चोट लगने पर उठाए जाने वाले कदमों के बारे में अधिक विस्तार से चर्चा करेंगे।

 



फुटनोट:

[1] सहीह मुस्लिम

[2] सहीह अल-बुखारी, सहीह मुस्लिम

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