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इस्लाम में महिलाएं (2 भाग का 2)

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विवरण: इस्लाम में महिलाओं का सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक पहलू

  • द्वारा Mostafa Malaekah
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 193 (दैनिक औसत: 2)
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इस्लाम में महिलाओं का सामाजिक पहलू

अ) एक बेटी के रूप में:

(1) क़ुरआन ने कन्या भ्रूण हत्या की क्रूर प्रथा को समाप्त किया, जो इस्लाम से पहले थी। ईश्वर ने कहा है:

"और जब जीवित गाड़ी गयी कन्या से प्रश्न किया जायेगाः कि वह किस अपराध के कारण वध की गयी।" (क़ुरआन 81:8-9)

(2)  एक बच्चे के जन्म के बजाय एक बच्ची के जन्म की खबर सुनकर कुछ माता-पिता के अनिच्छुक रवैये के लिए क़ुरआन ने आगे बढ़ कर उन को फटकार लगाई है। ईश्वर ने कहा है:

"और जब उनमें से किसी को पुत्री (के जन्म) की शुभसूचना दी जाये, तो उसका मुख काला हो जाता है और वह शोकपूर्ण हो जाता है। और लोगों से छुपा फिरता है, उस बुरी सूचना के कारण, जो उसे दी गयी है। (सोचता है कि) क्या उसे अपमान के साथ रोक ले अथवा भूमि में गाड़ दे? देखो! वे कितना बुरा निर्णय करते हैं।” (क़ुरआन 16:58-59)

(3)  माता-पिता अपनी बेटियों का समर्थन करने और दया और न्याय का बर्ताव करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) ने कहा: "जो कोई भी दो बेटियों को परिपक्व और बालिग़ होने तक सहारा देता है, वह और मैं क़यामत के दिन इस तरह (और आपने अपनी उंगलियों को एक साथ पकड़कर इशारा किया) आएंगे।"

(4)  बेटियों के पालन-पोषण में एक महत्वपूर्ण पहलू जो उनके भविष्य को बहुत प्रभावित करता है, वह है शिक्षा। शिक्षा न केवल एक अधिकार है बल्कि सभी पुरुषों और महिलाओं के लिए एक जिम्मेदारी है। पैगंबर मुहम्मद ने कहा: "ज्ञान प्राप्त करना हर मुसलमान के लिए अनिवार्य है।" यहाँ "मुस्लिम" शब्द में पुरुष और महिला दोनों शामिल हैं।

(5)  इस्लाम में न तो महिला खतना की आवश्यकता है और न ही इस्लाम इसे बढ़ावा देता है। और जबकि यह शायद अफ्रीका के कुछ हिस्सों में कुछ मुसलमानों द्वारा किया जाता है, यह उन जगहों पर ईसाईयों सहित अन्य लोगों द्वारा भी किया जाता है, अतः वहां यह केवल स्थानीय रीति-रिवाजों और प्रथाओं का प्रतिबिंब है।

ब)        पत्नी के रूप में:

(1)             इस्लाम में विवाह आपसी शांति, प्रेम और करुणा पर आधारित है, न कि केवल मानव यौन इच्छा की संतुष्टि पर। शादी के बारे में क़ुरआन में सबसे प्रभावशाली छंद निम्नलिखित हैं:

"तथा उसकी निशानियों में से ये है कि उत्पन्न किये, तुम्हारे लिए, तुम्हीं में से जोड़े, ताकि तुम शान्ति प्राप्त करो उनके पास तथा उत्पन्न कर दिया तुम्हारे बीच प्रेम तथा दया, वास्तव में, इसमें कई निशाननियाँ हैं उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।” (क़ुरआन 30:21। 42:11 और 2:228 भी देखें)

(2)   महिला को विवाह प्रस्तावों को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है। इस्लामिक कानून के मुताबिक, महिलाओं को उनकी मर्जी के बिना किसी से शादी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

(3)  पति परामर्श (क़ुरआन 2:233 देखें) और दया  (क़ुरआन 4:19 देखें) के ढांचे के भीतर परिवार के रखरखाव, सुरक्षा और समग्र नेतृत्व के लिए जिम्मेदार है। पति और पत्नी की भूमिका की पारस्परिकता और पूरक प्रकृति का अर्थ किसी भी पक्ष द्वारा दूसरे की अधीनता नहीं है। पैगंबर मुहम्मद ने मुसलमानों को महिलाओं के बारे में निर्देश दिया: "मैं आपसे महिलाओं के प्रति अच्छा होने का आग्रह करता हूं।" और "तुम में सबसे अच्छे वे हैं, जो अपनी पत्नियों के प्रति सबसे अच्छे हैं।" क़ुरआन पतियों से अपनी पत्नियों के प्रति दयालु और विचारशील होने का आग्रह करता है, भले ही पत्नी अपने पति के पक्ष में न हो या उसके लिए उसके प्रति अनिच्छा पैदा हो:

"... तथा उनके साथ उचित व्यवहार से रहो। फिर यदि वे तुम्हें अप्रिय लगें, तो संभव है कि तुम किसी चीज़ को अप्रिय समझो और ईश्वर ने उसमें बड़ी भलाई रख दी हो।” (क़ुरआन 4:19)

इसने इस्लाम से पहले की अरब प्रथा को भी गैरकानूनी घोषित कर दिया था, जिसके तहत मृत पिता के सौतेले बेटे को अपने पिता की विधवा को (बतौर विरासत) अपने अधिकार में लेने की अनुमति दी गई थी जैसे वे मृतक की संपत्ति का हिस्सा हों। (क़ुरआन 4:19 देखें) .

(4)  यदि वैवाहिक विवाद उत्पन्न होते हैं, तो क़ुरआन जोड़ों को निष्पक्षता और अच्छाई की भावना से निजी तौर पर हल करने के लिए प्रोत्साहित करता है। वास्तव में, क़ुरआन पति और पत्नी के वैवाहिक जीवन में निरंतर संघर्ष को हल करने के लिए एक प्रबुद्ध कदम और बुद्धिमान दृष्टिकोण की रूपरेखा तैयार करता है। यदि पति और पत्नी के बीच विवाद को समान रूप से हल नहीं किया जा सकता है, तो क़ुरआन पति-पत्नी दोनों की ओर से पारिवारिक हस्तक्षेप के माध्यम से पक्षों के बीच मध्यस्थता निर्धारित करता है (क़ुरआन 4:35 देखें)।

(5)  तलाक एक अंतिम उपाय है, जिसकी अनुमति तो है, लेकिन इसके लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, क्योंकि क़ुरआन आस्था के संरक्षण और व्यक्ति अर्थात पुरुष और महिला के अधिकारों को समान रूप से सम्मान देता है। विवाह विघटन के रूपों में आपसी सहमति, पति की पहल, पत्नी की पहल (यदि यह उसके वैवाहिक अनुबंध का हिस्सा है), पत्नी की पहल पर अदालत का निर्णय (वैध कारण के लिए), और बिना किसी कारण के पत्नी की पहल पर आधारित एक अधिनियम शामिल है, बशर्ते वह अपना वैवाहिक उपहार (मेहर) अपने पति को लौटा दे। जब किसी भी कारण से विवाह संबंध को जारी रखना असंभव हो, तब भी पुरुषों को इसके एक सुखद अंत की तलाश करना सिखाया जाता है। ऐसे मामलों के बारे में क़ुरआन कहता है:

"और यदि स्त्रियों को (एक या दो) तलाक़ दे दो और उनकी निर्धारित अवधि (इद्दत) पूरी होने लगे, तो नियमानुसार उन्हें रोक लो अथवा नियमानुसार विदा कर दो। उन्हें हानि पहुँचाने के लिए न रोको।" (क़ुरआन 2:231, ये भी देखें 2:221 और 33:41)

(6)  बहुत से विवाह की प्रथा को इस्लाम के साथ इस तरह जोड़ना, जैसे यह इस्लाम के द्वारा ही पेश किया गया था, या यह इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार है, पश्चिमी साहित्य और मीडिया के सबसे स्थायी मिथकों में से एक है। बहुत से विवाह की प्रथा लगभग सभी देशों में मौजूद थी और हाल की शताब्दियों तक यहूदी और ईसाई धर्म द्वारा भी स्वीकृत किया गया था। इस्लाम ने बहुत से विवाह को अवैध नहीं ठहराया, जैसा कि कई लोगों और धार्मिक समुदायों ने किया था; बल्कि, इसने इसे विनियमित और सीमित किया। इसकी आवश्यकता नहीं है, लेकिन केवल शर्तों के साथ इसकी अनुमति दी गई है (क़ुरआन 4:3 देखें)। कानून की भावना, वह्य उतरने के समय भी, व्यक्तिगत और सामूहिक आकस्मिकताओं से निपटने के लिए है, जो समय-समय पर उत्पन्न हो सकती हैं। (उदाहरण के लिए युद्धों द्वारा पुरुषों और महिलाओं की संख्या के बीच पैदा किये गए असंतुलन) साथ ही विधवाओं और अनाथों की समस्या का एक नैतिक, व्यावहारिक और मानवीय समाधान प्रदान करना भी उद्देशित है।

स)        एक मां के रूप में:

(1)   क़ुरआन माता-पिता (विशेषकर माताओं) के प्रति दयालुता को ईश्वर की पूजा के बाद दूसरे स्थान पर रखता है:

"और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की वंदना न करो तथा माता-पिता के साथ उपकार करो, यदि तेरे पास दोनों में से एक वृध्दावस्था को पहुँच जाये अथवा दोनों, तो उन्हें उफ़ तक न कहो और न झिड़को और उनसे सादर बात बोलो। और उनके लिए विनम्रता का बाज़ू दया से झुका दो और प्रार्थना करोः हे मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन दोनों ने बाल्यावस्था में, मेरा लालन-पालन किया है।" (क़ुरआन 17:23-24, 31:14, 46:15, और 29:8 भी देखें)

(2)  स्वाभाविक रूप से, पैगंबर मुहम्मद ने अपने अनुयायियों के लिए इस व्यवहार को निर्दिष्ट किया, जिससे माताओं को मानवीय संबंधों में एक असमान स्थिति प्रदान की गई। एक आदमी पैगंबर मुहम्मद के पास आया और कहा, "हे ईश्वर के दूत! लोगों में से कौन मेरे अच्छे व्यवहार के अधिक योग्य है?” पैगंबर ने कहा: "तुम्हारी माँ।" उस आदमी ने कहा, "उसके बाद कौन?" पैगंबर ने कहा: "उसके बाद तुम्हारी माँ।" उस आदमी ने आगे पूछा, "उसके बाद कौन?" पैगंबर ने कहा: "उसके बाद तुम्हारी माँ।" उस आदमी ने फिर पूछा, "उसके बाद कौन?" पैगंबर ने कहा: "उसके बाद तुम्हारे पिता।"

द)        एक आस्तिक बहन के रूप में (सामान्य तौर पर):

(1) पैगंबर मुहम्मद के कथनों के अनुसार: "महिलाएं पुरुषों की शक़ाइक़ (जुड़वां आधा या बहनें) हैं।" यह कथनएक गहरा बयान है जो सीधे तौर पर दो लिंगों के बीच मानवीय समानता के मुद्दे से संबंधित है। यदि अरबी शब्द शक़ाईक़ का पहला अर्थ "जुड़वाँ हिस्सों" के रूप में लिया जाये, तो इसका मतलब है कि पुरुष समाज का एक आधा हिस्सा है, जबकि महिला दूसरा आधा हिस्सा। यदि दूसरा अर्थ "बहनों" को लिया जाये, तो भी इसका अर्थ वही होता है।

(2)  पैगंबर मुहम्मद ने सामान्य रूप से महिलाओं के प्रति दया, देखभाल और सम्मान की शिक्षा दी: "मैं महिलाओं के प्रति अच्छा रहने का आग्रह करता हूं।" यह महत्वपूर्ण है कि पैगंबर के इस तरह के निर्देश उनके निधन से कुछ समय पहले दिए गए विदाई तीर्थ संबोधन में उनके अंतिम निर्देशों और अनुस्मारक में से एक थे

(3)  हया (शर्म) और सामाजिक मेलजोल: पुरुषों और महिलाओं के (पोशाक और व्यवहार) के लिए उचित शर्म के मानदंड वह्य के स्रोतों (क़ुरआन और दूत की बातों) पर आधारित हैं और, जैसे, पुरुषों और महिलाओं को वैध रूप से ईश्वर के निर्देशों पर आधारित दिशानिर्देशों के रूप में माना जाता है, जिनके पीछे लक्ष्य और दिव्य ज्ञान होता है। वे इंसान द्वारा लगाए गए या सामाजिक रूप से लगाए गए प्रतिबंध नहीं हैं। यह जानना दिलचस्प है कि बाइबल भी स्त्रियों को अपना सिर ढकने के लिए प्रोत्साहित करती है: “यदि कोई स्त्री अपना सिर न ढांके, तो वह अपने बाल कटवाए; और यदि किसी स्त्री का बाल कटवाना वा मुंडाना लज्जा की बात हो, तो वह अपना सिर ढांपे।” (1 कोरिनथियन 11:6)।

इस्लाम में महिलाओं के कानूनी और राजनीतिक पहलू

(1)  कानून के समक्ष समानता: दोनों लिंग कानून और कानून की अदालतों के समक्ष समानता के हकदार हैं। न्याय लिंगविहीन है (क़ुरआन 5:38, 24:2, और 5:45 देखें)। महिलाओं के पास वित्तीय और अन्य मामलों में एक स्वतंत्र कानूनी इकाई होती है।

(2)  सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भागीदारी: सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सामान्य नियम सार्वजनिक मामलों में पुरुषों और महिलाओं की भागीदारी और सहयोग है (क़ुरआन 9:71 देखें)। शासकों के चुनाव में, सार्वजनिक मुद्दों में, कानून बनाने में, प्रशासनिक पदों पर, विद्वता और शिक्षण में और यहाँ तक कि युद्ध के मैदान में भी मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी के पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण हैं। सामाजिक और राजनीतिक मामलों में इस तरह की भागीदारी प्रतिभागियों की दोनों लिंगों की पूरक प्राथमिकताओं को नजरअंदाज किये बिना और विनम्रता और सदाचार के इस्लामी दिशानिर्देशों का उल्लंघन किए बिना आयोजित की गई थी।

अंत

वर्तमान युग में गैर-मुस्लिम महिलाओं ने जो मुकाम हासिल किया, वह पुरुषों की दया या प्राकृतिक प्रगति के कारण हासिल नहीं हुआ। यह महिला की ओर से एक लंबे संघर्ष और बलिदान के माध्यम से प्राप्त किया गया था और केवल तभी जब समाज को उसके योगदान और कार्य की आवश्यकता थी, विशेष रूप से दो विश्व युद्धों के दौरान, और तकनीकी परिवर्तन के बढ़ने के कारण। जबकि इस्लाम में इस तरह की दयालु और सम्मानजनक स्थिति का फैसला किया गया था, इसलिए नहीं कि यह सातवीं शताब्दी के पर्यावरण को दर्शाता है, और न ही महिलाओं और उनके संगठनों के खतरे या दबाव में, बल्कि इसकी आंतरिक सत्यता के कारण किया गया था।

यदि यह कुछ भी इंगित करता है, तो यह क़ुरआन की ईश्वरीय उत्पत्ति और इस्लाम के संदेश की सच्चाई को प्रदर्शित करेगा, जो मानव दर्शन और विचारधाराओं के विपरीत, अपने मानव पर्यावरण से आगे बढ़ने से बहुत दूर था; एक संदेश जिसने ऐसे मानवीय सिद्धांतों को स्थापित किया जो न तो समय के दौरान अप्रचलित हो गए और न ही भविष्य में अप्रचलित हो सकते हैं। आखिरकार, यह सर्वज्ञ और सब कुछ जानने वाले ईश्वर का संदेश है, जिसका ज्ञान और बौद्धिकता मानव विचार और प्रगति में परम से बहुत आगे है।

 

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