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इस्लाम, एक महान सभ्यता (2 का भाग 1): परिचय

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विवरण: एक सभ्यता के रूप में इस्लाम धर्म की महानता के बारे में विभिन्न गैर-मुस्लिम विद्वानों और बुद्धिजीवियों के कथन। भाग 1: परिचय।

  • द्वारा iiie.net
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 387 (दैनिक औसत: 2)
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इस्लाम जो मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) को दिया गया था वह इससे पहले के सभी धर्मों का विस्तार और परिणति है, और इसलिए यह सभी समय और सभी लोगों के लिए है। इस्लाम की यह स्थिति चकाचौंध तथ्यों से जीवित है। सबसे पहले, कोई अन्य आसमानी पुस्तक उसी रूप और सामग्री में मौजूद नहीं है जैसा कि इसे उतारा गया था। दूसरा, कोई अन्य धर्म मानव जीवन के सभी क्षेत्रों में सभी समय का मार्गदर्शन करने का कोई ठोस दावा नही करता है। लेकिन इस्लाम बड़े पैमाने पर मानवता को संबोधित करता है और सभी मानवीय समस्याओं के बारे में बुनियादी मार्गदर्शन करता है। इसके अलावा, यह चौदह सौ वर्षों की कसौटी पर खरा उतरा है और इसमें एक आदर्श समाज की स्थापना की सभी क्षमताएं हैं, जैसा कि अंतिम पैगंबर मुहम्मद के नेतृत्व में हुआ था।

यह एक चमत्कार ही था कि पैगंबर मुहम्मद अपने सबसे कट्टर दुश्मनों को भी पर्याप्त भौतिक संसाधनों के बिना इस्लाम की ओर ला सकते थे। मूर्तियों की पूजा करने वाले, पूर्वजों के तरीकों को अंधो की तरह मानने वाले, झगड़ों को बढ़ावा देने वाले, और मानवीय गरिमा और रक्त का अपमान करने वाले, इस्लाम और उसके पैगंबर के मार्गदर्शन में सबसे अनुशासित राष्ट्र बन गए। इस्लाम ने धार्मिकता को योग्यता और सम्मान की एकमात्र कसौटी के रूप में घोषित करके उनके सामने आध्यात्मिक ऊंचाइयों और मानवीय गरिमा के द्वार खोले। इस्लाम ने बुनियादी कानूनों और सिद्धांतों से उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक और व्यावसायिक जीवन को आकार दिया जो मानव प्रकृति के अनुरूप हैं और ये हर समय लागू होते हैं क्योंकि मानव स्वभाव बदलता नही है।

यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि पश्चिमी ईसाइयों ने आरंभिक चरण में इस्लाम की अभूतपूर्व सफलता को ईमानदारी से समझने की बजाय इसे एक प्रतिद्वंद्वी धर्म के रूप में माना। सदियों से चल रहे धर्मयुद्ध के दौरान, इस सोंच को बहुत बल और प्रोत्साहन मिला और इस्लाम की छवि को धूमिल करने के लिए भारी मात्रा मे साहित्यों की रचना की गई। लेकिन इस्लाम ने अपनी वास्तविकता को आधुनिक विद्वानों को दिखाना शुरू कर दिया, इस्लाम के बारे मे इन विद्वानों की साहसिक और उद्देश्यपूर्ण टिप्पणियों ने तथाकथित निष्पक्ष प्राच्यवादियों द्वारा इसके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया।

यहां हम आधुनिक समय के गैर-मुस्लिम विद्वानों द्वारा इस्लाम पर कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत करते हैं। सत्य को अपनी पैरवी के लिए किसी अधिवक्ता की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इस्लाम के खिलाफ लंबे समय तक दुर्भावनापूर्ण प्रचार ने स्वतंत्र और उद्देश्यपूर्ण विचारकों के मन में भी बहुत भ्रम पैदा कर दिया है।

हम आशा करते हैं कि निम्नलिखित टिप्पणियां इस्लाम के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन को आरंभ करने में योगदान देंगे।

कैनन टेलर, वॉलवरहैमटन में चर्च कांग्रेस से पहले पढ़ा गया पेपर, 7 अक्टूबर 1887, दी प्रीचिंग ऑफ़ इस्लाम में अर्नोंड द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 71-72:

“इस्लाम ने हठधर्मिता को साहस मे बदल दिया। यह दास को आशा देता है, मानव जाति को भाईचारा देता है, और मानव स्वभाव के मूलभूत तथ्यों को मान्यता देता है।"

सरोजिनी नायडू का "दी लीडर्स ऑफ़ इस्लाम" पर व्याख्यान, सरोजिनी नायडू के भाषण और लेख देखें, मद्रास, 1918, पृष्ठ 167:

"न्याय की भावना इस्लाम के सबसे अद्भुत आदर्शों में से एक है, क्योंकि मैंने जब क़ुरआन पढ़ा, तो मुझे जीवन के वो गतिशील सिद्धांत मिलें जो रहस्यवादी नही हैं लेकिन पूरी दुनिया के लिए अनुकूल जीवन के दैनिक आचरण के लिए व्यावहारिक नैतिकता है।"

डी लेसी ओ'लेरी, इस्लाम एट द क्रॉसरोड्स, लंदन, 1923, पृष्ठ 8:

"हालांकि इतिहास यह स्पष्ट करता है कि दुनिया भर में फैले कट्टर मुसलमानों की किंवदंती और विजयी जातियों को तलवार के बल पर इस्लाम कबूल करने को मजबूर करना सबसे काल्पनिक रूप से बेतुके मिथकों में से एक है जिसे इतिहासकारों ने कभी दोहराया है।

एच.ए.आर. गिब, विदर इस्लाम, लंदन, 1932, पृष्ठ 379:

"लेकिन इस्लाम के पास मानवता के लिए एक और सेवा है। यह यूरोप की तुलना में वास्तविक पूर्व के अधिक निकट है, और इसमें अंतर-नस्लीय समझ और सहयोग की एक शानदार परंपरा है। मानव जाति की इतनी सारी विभिन्न जातियों की स्थिति, अवसर और प्रयासों की समानता में एकजुट होने में सफलता का ऐसा रिकॉर्ड किसी अन्य समाज के पास नहीं है ... इस्लाम में अभी भी नस्ल और परंपरा के स्पष्ट रूप से अपरिवर्तनीय तत्वों को समेटने की शक्ति है। यदि कभी पूर्व और पश्चिम के महान समाजों के विरोध को सहयोग से बदलना है, तो इस्लाम की मध्यस्थता एक अनिवार्य शर्त है। इसमे काफी हद तक उस समस्या का समाधान है जो यूरोप अपने संबंधों मे पूर्व के साथ झेल रहा है। यदि वे एकजुट हो जाते हैं, तो शांतिपूर्ण मुद्दे की आशा अथाह रूप से बढ़ जाएगी। लेकिन अगर यूरोप इस्लाम के सहयोग को ठुकरा देता है, तो यह मुद्दा दोनों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

जी.बी. शॉ, द जेनुइन इस्लाम, वॉल्यूम 1, नंबर 81936:

"मैंने हमेशा मुहम्मद के धर्म को उसकी अद्भुत जीवन शक्ति के कारण उच्च सम्मान दिया है। यह एकमात्र ऐसा धर्म है जो अस्तित्व के बदलते चरण में आत्मसात करने की क्षमता रखता है जो खुद को हर युग के लिए आकर्षक बनाता है। मैंने उनका अध्ययन किया है - मेरी राय में एक अद्भुत व्यक्ति जो मसीह विरोधी नही है, उसे मानवता का उद्धारकर्ता कहा जाना चाहिए। मेरा मानना है कि अगर उनके जैसा आदमी आधुनिक दुनिया की तानाशाही ग्रहण कर लेता है, तो वह उसकी समस्याओं को इस तरह से हल करने में सफल होगा जिससे उसे बहुत आवश्यक शांति और खुशी मिल सके: मैंने मुहम्मद के विश्वास के बारे में भविष्यवाणी की है कि यह कल के यूरोप को स्वीकार्य होगा क्योंकि यह आज के यूरोप को स्वीकार्य होने लगा है।"

 

 

इस्लाम, एक महान सभ्यता (2 का भाग 2): और अधिक कथन

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विवरण: एक सभ्यता के रूप में इस्लाम धर्म की महानता के बारे में विभिन्न गैर-मुस्लिम विद्वानों और बुद्धिजीवियों के कथन। भाग 2: और अधिक कथन।

  • द्वारा iiie.net
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  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
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ए.जे. टॉयनबी, सिविलाइजेशन ऑन ट्रायल, न्यूयॉर्क, 1948, पृष्ट 205:

"मुसलमानों के बीच जातिवाद का खत्म होना इस्लाम और समकालीन दुनिया में उत्कृष्ट उपलब्धियों में से एक है। जैसा कि होता है, इस इस्लामी सद्गुण के प्रचार-प्रसार की सख्त जरूरत है।"

ए.एम.एल. स्टोडर्ड, इस्लाम - द रिलिजन ऑफ़ आल प्रोफेट्स में उद्धृत, बेगम बवानी वक्फ, कराची, पाकिस्तान, पृष्ट 56:

“इस्लाम का उदय शायद मानव इतिहास की सबसे अद्भुत घटना है। यह एक ऐसी भूमि और लोगों से उत्पन्न हुआ जो पहले नगण्य थे, इस्लाम एक सदी के भीतर आधी पृथ्वी पर फैल गया, महान साम्राज्यों को तोड़ दिया, लंबे समय से स्थापित धर्मों को उखाड़ फेंका, जातियों को फिर से बनाया, और एक पूरी नई दुनिया बनाई - इस्लाम की दुनिया।

"हम इस विकास की जितनी करीब से जांच करते हैं, यह उतना ही असाधारण दिखाई देता है। अन्य महान धर्मों ने धीरे-धीरे, दर्दनाक संघर्ष से अपना रास्ता तय किया और अंत में शक्तिशाली राजाओं की सहायता से विजय प्राप्त की जो नए विश्वास में परिवर्तित हो गए। ईसाई धर्म का कॉन्स्टेंटाइन, बौद्ध धर्म का अशोक, और पारसी धर्म का साइरस था, प्रत्येक ने अपने चुने हुए पंथ को धर्मनिरपेक्ष अधिकार की शक्तिशाली शक्ति दी। इस्लाम ऐसे नहीं फैला। यह एक मरुस्थलीय जगह से फैला, जिसमें एक खानाबदोश जाति पहले से ही मानव इतिहास में अविभाज्य थी, इस्लाम ने अपने महान साहसिक कार्य को सबसे कम मानव समर्थन के साथ और सबसे कठिन भौतिक बाधाओं के खिलाफ आगे बढ़ाया। फिर भी इस्लाम ने चमत्कारी सहजता के साथ जीत हासिल की, और कुछ पीढ़ियों ने उग्र वर्धमान को पायरेनीज़ से हिमालय तक और मध्य एशिया के रेगिस्तान से मध्य अफ्रीका के रेगिस्तान तक विजयी होते देखा।”

एडवर्ड मॉन्टेट, "ला प्रोपेगैंडा क्रेटियेन इट एडवर्सरीज मुसलमान", पेरिस, 1890, टी.डब्ल्यू. अर्नोल्ड इन द प्रीचिंग ऑफ इस्लाम, लंदन, 1913, पृष्ट 413-414:

"इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो व्युत्पत्ति और ऐतिहासिक रूप से माने जाने वाले इस शब्द के व्यापक अर्थों में अनिवार्य रूप से तर्कसंगत है। तर्कवाद की परिभाषा एक ऐसी प्रणाली के रूप में जो कारण द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों पर धार्मिक विश्वास को आधार बनाती है ... इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि संतों की पूजा से लेकर माला और ताबीज के उपयोग तक कई सिद्धांत और धर्मशास्त्र और कई अंधविश्वास भी हैं, जो मुस्लिम पंथ के मुख्य हिस्सों के रूप मे जुड़ गए हैं। लेकिन पैगंबर की शिक्षाओं के हर तरह से समृद्ध विकास के बावजूद, क़ुरआन ने हमेशा अपनी जगह को मौलिक प्रारंभिक बिंदु के रूप में रखा है, और ईश्वर की एकता की हठधर्मिता हमेशा एक भव्य, महिमापूर्ण, एक अपरिवर्तनीय पवित्रता के साथ घोषित की गई है, उस निश्चित विश्वास के साथ जिसे इस्लाम के दायरे से बाहर कर पाना मुश्किल है। धर्म की मौलिक हठधर्मिता के प्रति यह निष्ठा, जिस सूत्र में इसे प्रतिपादित किया गया है, उसकी मौलिक सरलता, इसका प्रचार करने वाले प्रचारकों के उत्साहपूर्ण विश्वास से इसका प्रमाण मिलता है, ये मुस्लिम प्रचारक प्रयासों की सफलता की व्याख्या करने के कई कारण हैं। एक पंथ को इतना सटीक, सभी धार्मिक जटिलताओं से दूर और फलस्वरूप सामान्य समझ के लिए इतना सुलभ होने की उम्मीद की जा सकती है और वास्तव मे यह लोगों के मन मे अपनी जगह बनाने की अद्भुत शक्ति रखता है।”

डब्ल्यू. मोंटगोमरी वाट, इस्लाम एंड क्रिस्टयनिटी टुडे, लंदन, 1983, पृष्ट IX:

"मैं सामान्य अर्थों में मुस्लिम नहीं हूं, हालांकि मुझे आशा है कि मैं "मुस्लिम" हूं जिसने "ईश्वर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है", लेकिन मेरा मानना ​​है कि क़ुरआन और इस्लामी दृष्टि के अन्य भावों में निहित ईश्वरीय सत्य के विशाल भंडार हैं जिससे मुझे और अन्य पश्चिमी लोगों को अभी भी बहुत कुछ सीखना है, और 'इस्लाम निश्चित रूप से भविष्य के एक धर्म के बुनियादी ढांचे की आपूर्ति के लिए एक मजबूत दावेदार है।'"

पॉल वरो मार्टिंसन (संपादक), इस्लाम, एन इंट्रोडक्शन टू क्रिस्टियन्स, ऑग्सबर्ग, मिनियापोलिस, 1994, पृष्ट 205:

"इस्लाम एक प्रामाणिक विश्वास है जो हमारे मुस्लिम पड़ोसियों के अंतरतम को आकार देता है और जीवन में उनके दृष्टिकोण को निर्धारित करता है और इस्लामी विश्वास आमतौर पर ईसाई धर्म के हालिया पश्चिमी आकार की तुलना में अधिक परंपरा उन्मुख है, जिसने धर्मनिरपेक्षता को काफी झेला है। फिर भी हम मुसलमानो के प्रति तभी निष्पक्ष होते हैं जब हम उन्हें उनके धार्मिक मूल से समझते हैं और एक आस्था समुदाय के रूप में उनका सम्मान करते हैं। आस्था की दृष्टि से मुसलमान अहम भागीदार बन गए हैं।”

जॉन एल्डन विलियम्स (संपादक), इस्लाम, जॉर्ज ब्राजिलर, न्यूयॉर्क, 1962, आवरण-पत्र के अंदर:

“इस्लाम औपचारिक धर्म से कहीं अधिक है: यह जीवन का एक अभिन्न तरीका है। कई मायनों में यह किसी भी अन्य विश्व धर्म की तुलना में अपने अनुयायियों के अनुभव में एक अधिक निर्णायक कारक है। मुसलमान ("वह जो ईश्वर के प्रति समर्पण करता है") हर समय ईश्वर के सामने रहता है और अपने जीवन और अपने धर्म, अपनी राजनीति और अपने विश्वास के बीच कोई अलगाव नहीं करता है। ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए सहयोग करने वाले लोगों के भाईचारे पर जोर देने से इस्लाम आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली धर्मों में से एक बन गया है।”

जॉन एल. एस्पोसिटो, इस्लाम, द स्ट्रेट पाथ, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, 1988, पृष्ट 3-4:

“इस्लाम सामी, भविष्यसूचक धार्मिक परंपराओं की एक लंबी कतार में खड़ा है जो एक अडिग एकेश्वरवाद, और ईश्वर के रहस्योद्घाटन, उनके पैगंबरों, नैतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही और न्याय के दिन में विश्वास करता है। ईसाइयों और यहूदियों की तरह ही मुसलमान भी इब्राहीम के बच्चे हैं, क्योंकि ये सभी अपने समुदायों का स्त्रोत उन्हीं को मानते हैं। ईसाई जगत और यहूदी धर्म के साथ इस्लाम के ऐतिहासिक धार्मिक और राजनीतिक संबंध पूरे इतिहास में मजबूत रहे हैं। यह आपसी लाभ के साथ-साथ गलतफहमी और संघर्ष का स्रोत रही है।”

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