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मेरी दया मेरे क्रोध से अधिक है (2 का भाग 1)

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विवरण: ईश्वर में दया कैसे प्रकट होती है, और पैगंबर और उनके साथियों की दया के उदाहरण

  • द्वारा Hala Salah (Reading Islam)
  • पर प्रकाशित 04 Nov 2021
  • अंतिम बार संशोधित 04 Nov 2021
  • मुद्रित: 0
  • देखा गया: 296 (दैनिक औसत: 3)
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"क्षमा करने और दंड न देने की इच्छा" दया शब्द के लिए अक्सर इस्तेमाल की जाने वाली परिभाषा है, लेकिन इस्लाम में दया क्या है?

इस्लाम में दया का एक गहरा अर्थ है जो हर मुसलमान के जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है, और दया दिखाने पर उसे ईश्वर द्वारा पुरस्कृत किया जाता है।

ईश्वर की दया सभी जीवों पर होती है, हर उस चीज़ में दिखाई देती है जिसे हम देखते हैं। सूर्य में जो हमें प्रकाश और गर्मी देता है, और हवा और पानी में जो सभी जीवित लोगों के लिए आवश्यक है।

क़ुरआन के एक पुरे अध्याय का नाम ईश्वर की दिव्य विशेषता अर-रहमान या "सबसे दयालु" के नाम पर रखा गया है। इसके साथ ही ईश्वर की दो और विशेषता दया शब्द से बनती है। वो विषेशतायें है अर-रहमान और अर-रहीम हैं, जिसका अर्थ है "कृपालु" और "परम दयालु"। क़ुरआन के 113 अध्यायों की शुरुआत में पढ़े जाने वाले वाक्यांश में इन दो विशेषताओं का उल्लेख किया गया है: "ईश्वर के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील और दयावान् है।" यह वाक्यांश पाठको को ईश्वर की अंतहीन दया और महान उपहारों की निरंतर याद दिलाता है।

ईश्वर हमें आश्वासन देता है कि जो कोई भी पाप करता है, यदि वह माफ़ी मांग ले और उस पाप को करना बंद कर दे तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा, वह कहता है:

"तुम्हारे ईश्वर ने अपने ऊपर दया अनिवार्य कर ली है कि तुममें से जो भी अज्ञानता के कारण कोई पाप करेगा, फिर उसकी क्षमा याचना करेगा और अपने आप को सुधार लेगा, तो निःसंदेह अल्लाह अति क्षमाशील दयावान् है।" (क़ुरआन 6:54)

इस छंद की पुष्टि पैगंबर मुहम्मद के इस कथन से होती है, जिसमें उन्होंने कहा कि ईश्वर कहता है:

“मेरी दया मेरे क्रोध से अधिक है”

पैगंबर मुहम्मद ने भी दया और करुणा करने वालो के लिए इनाम का आश्वासन दिया:

“दया करने वाले लोगों पर "परम दयालु" दया करता है। तुम पृथ्वी पर रहने वालों पर दया करो, और जो स्वर्ग में है वह तुम पर दया करेगा" (अस-सुयुति)।

पैगंबर की दया

पैगंबर मुहम्मद की दया के बारे में बताने से पहले यह बताना अच्छा रहेगा कि स्वयं ईश्वर ने उनके बारे में क्या कहा है:

“(हे नबी!) हमने आपको भेजा है समस्त संसार के लिए दया बना कर (क़ुरआन 21:107)

...जो आश्वासन देता है कि इस्लाम दया पर आधारित है, और यह कि ईश्वर ने पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) को समस्त संसार के लिए दया बना कर भेजा है।

ईश्वर क़ुरआन में भी कहता है:

"तुम्हारे पास तुम्हीं में से ईश्वर का एक पैगंबर आ गया है। उसे वो बात दुख पहुंचाती है जिससे तुम्हें दुख हो, वह तुम्हारी सफलता की लालसा रखता है और विश्वासियों के लिए करुणामय और दयावान् हैं।" (क़ुरआन 9:128)

ये छंद पैगंबर के शिष्टाचार और व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखता था, क्योंकि उन्होंने ईश्वर का संदेश देने के लिए कई कठिनाइयों का सामना किया। पैगंबर अपने लोगों का मार्गदर्शन करने में भी सबसे शांत थे, और जब भी लोग उन्हें नुकसान पहुंचाते थे, तो वो हमेशा ईश्वर से उनकी अज्ञानता और क्रूरता के लिए क्षमा करने की प्रार्थना करते थे।

पैगंबर के साथी

साथियों का वर्णन करते हुए ईश्वर क़ुरआन में कहता है:

“मुहम्मद ईश्वर के पैगंबर हैं; और जो उनके साथ हैं, वे अविश्वासियों पर भारी हैं और आपस में दयालु हैं" (क़ुरआन 48:29)

कुछ लोग कह सकते हैं कि मुहम्मद सदाचारी थे क्योंकि वह एक पैगंबर हैं, लेकिन उनके साथी सामान्य लोग थे जिन्होंने अपना जीवन ईश्वर और उनके पैगंबर की आज्ञाकारिता के लिए समर्पित कर दिया। उदाहरण के लिए, अबू बक्र अस-सिद्दीक ने अपनी सारी संपत्ति गुलामों को उनके क्रूर मालिकों से खरीदने में लगा दी और फिर उन्होंने गुलामों को ईश्वर की खातिर मुक्त कर दिया।

एक बार अपने साथियों को दया की सही अवधारणा समझाते हुए पैगंबर ने कहा कि यह परिवार और दोस्तों के प्रति दया दिखाना नहीं है, बल्कि यह आम जनता के प्रति दया और करुणा दिखाना है, चाहे आप उन्हें जानते हों या नहीं।

एक "छोटी" दया

इस्लाम से पहले की कुछ बेरहम परंपराएं थीं देवताओं के लिए बलिदान के रूप में अपने बच्चे को मारना और लड़कियों को जिंदा दफनाना। बच्चों के खिलाफ इन कृत्यों को क़ुरआन और पैगंबर की सुन्नत में कई बार सख्त वर्जित किया गया है।

बच्चों के प्रति पैगम्बर की दया की बात करें तो, वह एक बार प्रार्थना का नेतृत्व कर रहे थे और उनके नाती हसन और हुसैन अभी भी छोटे बच्चे थे और खेल रहे थे और उनकी पीठ पर चढ़ रहे थे, अगर वे खड़े होते तो उन्हें चोट लग सकती थी, इसलिए पैगंबर ने अपनी प्रार्थना की अवधि को बढ़ा दिया। एक और उदाहरण, पैगंबर ने एक बार अपनी नतिनी उमामा को लेकर प्रार्थना की थी।

पैगंबर की यह दया न केवल उनके अपने बच्चों पर बल्कि सड़क पर खेलने वाले बच्चों पर भी थी। वो जैसे ही पैगंबर को देखते, उनके पास दौड़ते हुए आते और पैगंबर उन सभी को एक हलकी मुस्कान के साथ गले लगाते।

प्रार्थना के दौरान भी पैगंबर की सहज दया स्पष्ट थी, जैसा कि उन्होंने एक बार कहा था:

"(ऐसा होता है) मैं प्रार्थना लंबी करने के इरादे से शुरू करता हूं, लेकिन किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर, मैं प्रार्थना को छोटा कर देता हूं क्योंकि मुझे पता है कि बच्चे के रोने से उसकी मां के दिल पर कैसी चोट पड़ती है" (साहिह अल-बुखारी)

कई जगह पैगंबर ने हमें सिखाया कि कैसे बच्चों को एक दयालु और प्यार भरे माहौल में पालना चाहिए, उनको पीटना नहीं चाहिए, या उनके चेहरे पर नहीं मारना चाहिए ये उन्हें अपमान से बचाते है। जब एक आदमी ने एक बार पैगंबर को अपने पोते को चूमते हुए देखा, तो वह पैगंबर की उदारता पर आश्चर्यचकित हुआ और कहा, "मेरे दस बच्चे हैं लेकिन मैंने उनमें से किसी को कभी भी नहीं चूमा है।" पैगंबर ने कहा,

"वह जो दया नहीं दिखाता, उस पर कोई दया नहीं दिखाई जाएगी" (सहीह अल-बुखारी)

सिर्फ एक बार बालों को सहलाना

जब ईश्वर ने क़ुरआन में अनाथों का उल्लेख किया तो उन्होंने कहा कि इसका क्या अर्थ है:

"इसलिए, अनाथों के साथ कठोरता का व्यवहार न करें" (क़ुरआन 93:9)

इस छंद के अनुसार अनाथों के प्रति पैगंबर का व्यवहार आया और उन्होंने कहा:

पैगंबर ने अपनी तर्जनी और बीच की उंगली को एक साथ जोड़ा और कहा कि "मैं और वह व्यक्ति जो एक अनाथ की देखभाल करता है और उसको खिलाता है, वह इस तरह स्वर्ग में जायेगा।" (अबू दाऊद)

अनाथ को अच्छा महसूस करवाने के लिए और अगर उसने अपने माता-पिता का स्नेह खो दिया है, तो अभी भी ऐसे लोग हैं जो उससे प्यार करने और उसकी देखभाल करने को तैयार हैं, पैगंबर ने दयालुता को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि वह व्यक्ति जो एक अनाथ के सिर को सहलायेगा उसे प्रत्येक बाल के लिए अच्छे कामों से पुरस्कृत किया जायेगा।

ईश्वर और उनके पैगंबर ने अनाथ की संपत्ति की सुरक्षा करने के लिए स्पष्ट रूप से कहा। उदाहरण के लिए, ईश्वर कहता है कि इसका क्या अर्थ है:

"जो लोग अनाथों की संपत्ति अन्याय से हड़पते हैं, वे अपने पेटों में आग भरते हैं और शीघ्र ही नरक की अग्नि में प्रवेश करेंगे।" (क़ुरआन 4:10)

पैगंबर का एक कथन हमें यह भी बताता है कि सात सबसे गंभीर पापों में से एक अनाथ की संपत्ति को हड़पना है।

 

 

मेरी दया मेरे क्रोध से अधिक है (2 का भाग 2)

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विवरण: दया शत्रुओं और जानवरों के लिए भी है।

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क्या यह युद्ध हो सकता है?

इस्लाम युद्ध और शांति के समय दुश्मनों पर भी दया करने को कहता है, क्योंकि पैगंबर मुहम्मद अपने साथियों से उन रिश्तेदारों को बुलाकर और उन्हें उपहार देकर उनके साथ पारिवारिक संबंध बनाए रखने को कहते थे जो अभी भी अविश्वासी थे।

जहां तक युद्ध की बात है, तो यदि दुश्मन शरण मांगे तो ईश्वर ने मुसलमानों को आदेश दिया की वो दुश्मनों को शरण दें, और किसी को भी उन्हें नुकसान पहुंचाने से मना करें। यह क़ुरआन में कहा गया है, जहां ईश्वर कहता है कि इसका क्या अर्थ है:

"और यदि कोई मूर्तिपूजक तुमसे शरण मांगे, तो उसे शरण दे दो, ताकि वो ईश्वर की बातें सुन सके। फिर उसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दो। ऐसा इसलिए कि वे ज्ञान नहीं रखते हैं।" (क़ुरआन 9:6)

पैगंबर ने अपने साथियों को बुजुर्गों, घायलों, महिलाओं, बच्चों और पूजा स्थलों में लोगों को नुकसान पहुंचाने से मना किया था। इसके साथ ही खेतों को नष्ट करना मना है। शत्रुओं की लाशों को विकृत करने पर सख्त प्रतिबंध लगाया था और उन्हें सम्मान से जल्दी दफनाने का आदेश दिया गया था।

बंदियों के संबंध में पैगंबर के आदेशों का उनके साथियों ने सख्ती से पालन किया। एक कहानी में एक बंदी हमसे जुड़ी एक लड़ाई के बारे में कहता है कि पकड़े जाने के बाद वह एक मुस्लिम परिवार के साथ रह रहा था। जब भी वे भोजन करते थे, तो वे उसे पहले रोटी खिलाते थे जबकि वे खुद केवल खजूर खाते थे।

जब पैगंबर (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) कुरैश को हराने के बाद मक्का में पहुंचे तो वह उनके पास गए और उनसे पूछा:

"तुम मुझसे कैसे व्यवहार की उम्मीद करते हो?"

उन्होंने कहा, “आप एक सज्जन भाई हो और एक सज्जन भाई के पुत्र हो! हम आपसे अच्छाई के अलावा और कुछ नहीं चाहते।"

फिर पैगंबर ने घोषणा की, "मैं तुमसे वही बात कहता हूं जो यूसुफ (पैगंबर यूसुफ) ने अपने भाइयों से कहा था:

"आज तुमपर कोई दोष नहीं, ईश्वर तुम्हें क्षमा कर दे, वही सर्वाधिक दयावान् है" (क़ुरआन 12:92)  

जाओ, क्योंकि तुम वास्तव में स्वतंत्र हो।"

उस समय जब सहिष्णुता और क्षमा की उम्मीद कम ही होती थी, पैगंबर ने सभी बंदियों को बिना रकम के रिहा करके दया और क्षमा का एक उदाहरण स्थापित किया, और मुसलमानों के उत्पीड़न और क्रूर यातना से उन्हें बचा लिया, जो इस्लाम का संदेश देने के बाद के शुरुआती 13 वर्षों तक होता रहा था।

ईश्वर के बनाये सभी जीव

इस्लाम में जानवरों की भी उपेक्षा नहीं की गई और उन्हें कई अधिकार दिए गए हैं। उदाहरण के लिए, जब पैगंबर ने एक गधे के चेहरे पर छाप देखा, तो उन्होंने कहा:

 "क्या तुमने नहीं सुना कि मैंने ऐसे व्यक्ति को शाप दिया है जो किसी जानवर के चेहरे पर छाप लगाता है या जो उसके चेहरे पर मारता है?" (सहीह मुस्लिम)

पैगंबर ने एक बार कहा था कि एक महिला को एक बिल्ली के कारण नरक में भेजा गया, क्योंकि उसने बिल्ली को कैद कर रखा था, वो न तो उसे खिलाती थी और न ही उसे छोड़ती थी ताकि वो खुद अपने भोजन के लिए शिकार कर सके। दूसरी ओर पैगंबर ने कहा कि एक आदमी को स्वर्ग इसलिए भेजा गया क्योंकि उसने रेगिस्तान में प्यास से तड़प रहे एक कुत्ते को पानी पिलाया था।

पैगंबर ने जानवरों का वध करने से पहले उनके सामने चाकू की धार तेज करने से मना किया। इसके अलावा, एक जानवर को दूसरे के सामने मारना प्रतिबंधित है। यह पैगंबर के एक कथन से स्पष्ट है:

"ईश्वर हर चीज में दया चाहता है, इसलिए जानवरों को मारते और वध करते समय तुम दयालु रहो: उनके दर्द को कम करने के लिए अपने चाकू की धार तेज रखो" (सहीह अल-बुखारी)।

पैगंबर के साथियों में से एक ने ये घटना बताई: जब वे पैगंबर के साथ यात्रा कर रहे थे, तो उन्होंने एक चिड़िया को देखा जो अपने छोटे बच्चों के साथ थी, उन्होंने उस माँ से उसके बच्चे ले लिए। चिड़िया आयी और अपने पंख फड़फड़ाने लगी, तो पैगंबर ने कहा:

“किसने इस चिड़िया का बच्चा लेकर उसे दुख दिया है? उन्हें शीघ्र लौटा दो” (सहीह अल-बुखारी)।

पैगंबर ने जानवरों के अधिकारों की पुष्टि की जब उन्होंने कहा कि जो कोई भी एक जीवित वस्तु को लक्ष्य के रूप लेगा वह शापित है। जानवरों को उस हद तक लड़ने के लिए मजबूर करना की वो एक दूसरे में सींघ घुसा दें प्रतिबंधित है, क्योंकि जानवरों में भावनाएं होती हैं और यह उनके लिए निश्चित ही यातना होगी।

दया की इस्लामी अवधारणा समग्र है और पूरी सृष्टि की खुद के साथ और सृष्टिकर्ता के साथ परस्पर संबंध पर जोर देती है। दया ईश्वर से शुरू होती है और वो प्रत्येक जीवित प्राणी को दया देता है। जानवर और मनुष्य समान रूप से एक दूसरे के साथ सद्भाव से रहने के लिए दया दिखाते हैं, और इस दया के बदले में ईश्वर उन पर और भी अधिक दया दिखाता है। इस्लाम की यह दृष्टि लोगों के बीच की बाधाओं को तोड़ने को प्रोत्साहित करती है और वह अंतर्निहित नींव है जिस पर जीवन और सभ्यता दोनों का निर्माण होता है।

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